यह उपनिषदों की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है। कल्पना करो — एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हैं। दोनों मित्र हैं, सदा साथ रहते हैं। एक पक्षी पेड़ के फल खा रहा है — कभी मीठा फल, कभी कड़वा। दूसरा पक्षी चुपचाप बैठा है, कुछ नहीं खा रहा, बस देख रहा है।
इस उपमा में पेड़ है यह शरीर, फल खाने वाला पक्षी है जीवात्मा (हमारा मन जो सुख-दुःख भोगता है), और चुपचाप देखने वाला पक्षी है परमात्मा जो सदा हमारे भीतर रहता है, सब देखता है, लेकिन किसी भोग में लिप्त नहीं होता।
इस श्लोक में कहा गया है कि जब फल खाने वाला पक्षी थककर, दुःखी होकर दूसरे पक्षी की ओर देखता है — तब उसे शांति मिलती है। ठीक वैसे ही जब मनुष्य संसार के भोगों से थककर अपने भीतर के परमात्मा की ओर मुड़ता है, तब उसे सच्ची शांति मिलती है।