📿 श्लोक संग्रह

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया

मुण्डकोपनिषद् 3.1.1 उपनिषद्
📖 मुण्डकोपनिषद्, अथर्ववेद
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
द्वा
दो
सुपर्णा
सुंदर पंखों वाले पक्षी
सयुजा
सदा साथ रहने वाले
सखाया
मित्र
समानम्
एक ही
वृक्षम्
पेड़ पर
परिषस्वजाते
बैठे हुए हैं
तयोः
उन दोनों में से
अन्यः
एक
पिप्पलम्
पीपल के फल को
स्वाद्वत्ति
स्वाद लेकर खाता है
अनश्नन्
बिना खाए
अभिचाकशीति
देखता रहता है

यह उपनिषदों की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है। कल्पना करो — एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे हैं। दोनों मित्र हैं, सदा साथ रहते हैं। एक पक्षी पेड़ के फल खा रहा है — कभी मीठा फल, कभी कड़वा। दूसरा पक्षी चुपचाप बैठा है, कुछ नहीं खा रहा, बस देख रहा है।

इस उपमा में पेड़ है यह शरीर, फल खाने वाला पक्षी है जीवात्मा (हमारा मन जो सुख-दुःख भोगता है), और चुपचाप देखने वाला पक्षी है परमात्मा जो सदा हमारे भीतर रहता है, सब देखता है, लेकिन किसी भोग में लिप्त नहीं होता।

इस श्लोक में कहा गया है कि जब फल खाने वाला पक्षी थककर, दुःखी होकर दूसरे पक्षी की ओर देखता है — तब उसे शांति मिलती है। ठीक वैसे ही जब मनुष्य संसार के भोगों से थककर अपने भीतर के परमात्मा की ओर मुड़ता है, तब उसे सच्ची शांति मिलती है।

यह मंत्र मुण्डकोपनिषद् के तीसरे मुण्डक से है। यही उपमा ऋग्वेद (1.164.20) और श्वेताश्वतर उपनिषद् (4.6) में भी मिलती है, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाती है।

मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद से संबंधित है। इसमें तीन मुण्डक (खंड) हैं और यह मंत्र तीसरे मुण्डक की शुरुआत में आता है, जहाँ परमात्मा और जीवात्मा के संबंध की बात कही गई है।

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