📿 श्लोक संग्रह

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो

कठोपनिषद् 1.2.23 उपनिषद्
📖 कठोपनिषद्, कृष्ण यजुर्वेद
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम् ॥
नहीं
अयम्
यह
आत्मा
आत्मा
प्रवचनेन
प्रवचन (भाषण) से
लभ्यः
प्राप्त होने योग्य
मेधया
बुद्धि से
बहुना श्रुतेन
बहुत सुनने से
यम्
जिसको
एषः
यह (आत्मा)
वृणुते
चुनती है, वरण करती है
विवृणुते
प्रकट करती है
तनूम् स्वाम्
अपना स्वरूप

इस मंत्र में कहा गया है कि आत्मा को केवल बोलने, सुनने या बुद्धि लगाने से नहीं पाया जा सकता। बहुत से लोग बहुत किताबें पढ़ते हैं, बहुत प्रवचन सुनते हैं, लेकिन उससे आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता। यह ऐसा ही है जैसे स्वाद का वर्णन सुनने से भूख नहीं मिटती — खाना तो स्वयं खाना पड़ता है।

फिर कहा गया है कि आत्मा जिसे चुन लेती है, उसी को अपना स्वरूप दिखाती है। यह बात बहुत गहरी है। इसका अर्थ है कि जब कोई सच्चे मन से, पूरी लगन से आत्मा को जानने का प्रयास करता है, तब आत्मा स्वयं उसके सामने प्रकट हो जाती है।

जैसे सूरज की रोशनी सबके लिए है, लेकिन जो आँखें बंद किए बैठा है उसे दिखाई नहीं देगी। जो आँखें खोलेगा, उसे दिखेगी। आत्मा भी ऐसी ही है — वह सबमें है, लेकिन जो तैयार होता है, उसे ही दिखती है।

यह मंत्र कठोपनिषद् से है। कठोपनिषद् में नचिकेता नामक एक छोटे बालक की कथा है जो यमराज के पास जाता है और उनसे आत्मा के रहस्य के बारे में पूछता है। यमराज पहले उसे कई प्रलोभन देते हैं, लेकिन नचिकेता नहीं डिगता। तब यमराज प्रसन्न होकर उसे यह ज्ञान देते हैं।

कठोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित है और इसे प्रमुख उपनिषदों में गिना जाता है।

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