इस मंत्र में कहा गया है कि आत्मा को केवल बोलने, सुनने या बुद्धि लगाने से नहीं पाया जा सकता। बहुत से लोग बहुत किताबें पढ़ते हैं, बहुत प्रवचन सुनते हैं, लेकिन उससे आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता। यह ऐसा ही है जैसे स्वाद का वर्णन सुनने से भूख नहीं मिटती — खाना तो स्वयं खाना पड़ता है।
फिर कहा गया है कि आत्मा जिसे चुन लेती है, उसी को अपना स्वरूप दिखाती है। यह बात बहुत गहरी है। इसका अर्थ है कि जब कोई सच्चे मन से, पूरी लगन से आत्मा को जानने का प्रयास करता है, तब आत्मा स्वयं उसके सामने प्रकट हो जाती है।
जैसे सूरज की रोशनी सबके लिए है, लेकिन जो आँखें बंद किए बैठा है उसे दिखाई नहीं देगी। जो आँखें खोलेगा, उसे दिखेगी। आत्मा भी ऐसी ही है — वह सबमें है, लेकिन जो तैयार होता है, उसे ही दिखती है।