📿 श्लोक संग्रह

ईशावास्यमिदं सर्वं

ईशोपनिषद् 1 उपनिषद्
📖 ईशोपनिषद्, शुक्ल यजुर्वेद
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
ईशा
ईश्वर द्वारा
आवास्यम्
ढका हुआ, व्याप्त
इदम्
यह
सर्वम्
सब कुछ
यत् किञ्च
जो कुछ भी
जगत्याम्
संसार में
जगत्
चलने वाला (संसार)
तेन
उसके द्वारा (त्याग से)
त्यक्तेन
त्यागकर
भुञ्जीथाः
भोग करो
मा गृधः
लालच मत करो
कस्यस्वित्
किसका
धनम्
धन

यह ईशोपनिषद् का सबसे पहला मंत्र है और इसमें पूरे उपनिषद् का सार आ जाता है। इसमें कहा गया है कि यह सारा संसार — पेड़, पहाड़, नदी, आकाश, हर प्राणी — सब कुछ ईश्वर से भरा हुआ है। जैसे पानी में हर बूँद पानी ही होती है, वैसे ही इस संसार के हर कण में परमात्मा बसा है।

फिर कहा गया है — त्यागपूर्वक भोग करो। इसका मतलब यह है कि संसार की चीज़ों का उपयोग करो, लेकिन उन पर अपना अधिकार मत जताओ। जैसे हम बस में बैठते हैं, यात्रा पूरी होती है, फिर उतर जाते हैं — बस पर कब्ज़ा नहीं जमाते।

अंत में कहा गया है — किसी के धन का लालच मत करो। जो तुम्हारे पास है, उसी में संतोष रखो। यह श्लोक संतोष, त्याग और ईश्वर-दर्शन — तीनों की शिक्षा एक साथ देता है।

ईशोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम अध्याय है और सबसे छोटी उपनिषद् मानी जाती है — इसमें केवल 18 मंत्र हैं। लेकिन इन 18 मंत्रों में इतनी गहराई है कि परंपरा में इसे उपनिषदों का सार कहा जाता रहा है।

इस मंत्र से उपनिषद् की शुरुआत होती है और इसी से उपनिषद् का नाम 'ईशावास्य' पड़ा। 'ईशा' शब्द से आरंभ होने के कारण यह नाम प्रचलित हुआ।

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