यह ईशोपनिषद् का सबसे पहला मंत्र है और इसमें पूरे उपनिषद् का सार आ जाता है। इसमें कहा गया है कि यह सारा संसार — पेड़, पहाड़, नदी, आकाश, हर प्राणी — सब कुछ ईश्वर से भरा हुआ है। जैसे पानी में हर बूँद पानी ही होती है, वैसे ही इस संसार के हर कण में परमात्मा बसा है।
फिर कहा गया है — त्यागपूर्वक भोग करो। इसका मतलब यह है कि संसार की चीज़ों का उपयोग करो, लेकिन उन पर अपना अधिकार मत जताओ। जैसे हम बस में बैठते हैं, यात्रा पूरी होती है, फिर उतर जाते हैं — बस पर कब्ज़ा नहीं जमाते।
अंत में कहा गया है — किसी के धन का लालच मत करो। जो तुम्हारे पास है, उसी में संतोष रखो। यह श्लोक संतोष, त्याग और ईश्वर-दर्शन — तीनों की शिक्षा एक साथ देता है।