माण्डूक्योपनिषद् का यह पहला मंत्र है और इसमें बड़ी गहरी बात बहुत सरल शब्दों में कही गई है — ॐ ही सब कुछ है। जो कुछ भी इस संसार में दिखता है, सुनाई देता है, अनुभव होता है — वह सब ॐ का ही रूप है।
फिर कहा गया है — जो बीत चुका है, जो अभी हो रहा है, और जो आगे होगा — यह तीनों काल ॐकार ही हैं। और जो इन तीनों कालों से भी परे है — वह भी ॐकार ही है। जैसे समुद्र में छोटी-बड़ी सब लहरें पानी ही हैं, वैसे ही सारी सृष्टि ॐ से ही बनी है।
इसे ऐसे समझो — जब दादी सुबह उठकर ॐ बोलती हैं, तो वे इस पूरी सृष्टि का नाम ले रही होती हैं। ॐ में सब समाया हुआ है — सारे देवता, सारी प्रकृति, सारा जीवन।