📿 श्लोक संग्रह

ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं

माण्डूक्योपनिषद् 1 उपनिषद्
📖 माण्डूक्योपनिषद्, अथर्ववेद
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम् ।
तस्योपव्याख्यानम् ।
भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव ।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥
ओंकार (प्रणव)
इति
ऐसा
एतत्
यह
अक्षरम्
अविनाशी अक्षर
इदम् सर्वम्
यह सब कुछ
उपव्याख्यानम्
व्याख्या, विवरण
भूतम्
बीता हुआ (भूतकाल)
भवत्
वर्तमान
भविष्यत्
आने वाला (भविष्य)
ओंकारः एव
ओंकार ही है
त्रिकालातीतम्
तीनों कालों से परे

माण्डूक्योपनिषद् का यह पहला मंत्र है और इसमें बड़ी गहरी बात बहुत सरल शब्दों में कही गई है — ॐ ही सब कुछ है। जो कुछ भी इस संसार में दिखता है, सुनाई देता है, अनुभव होता है — वह सब ॐ का ही रूप है।

फिर कहा गया है — जो बीत चुका है, जो अभी हो रहा है, और जो आगे होगा — यह तीनों काल ॐकार ही हैं। और जो इन तीनों कालों से भी परे है — वह भी ॐकार ही है। जैसे समुद्र में छोटी-बड़ी सब लहरें पानी ही हैं, वैसे ही सारी सृष्टि ॐ से ही बनी है।

इसे ऐसे समझो — जब दादी सुबह उठकर ॐ बोलती हैं, तो वे इस पूरी सृष्टि का नाम ले रही होती हैं। ॐ में सब समाया हुआ है — सारे देवता, सारी प्रकृति, सारा जीवन।

माण्डूक्योपनिषद् सबसे छोटी प्रमुख उपनिषद् है — इसमें केवल 12 मंत्र हैं। लेकिन इन 12 मंत्रों में चेतना की चार अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) का पूरा विवरण दिया गया है।

यह उपनिषद् अथर्ववेद से संबंधित है। परंपरा में माण्डूक्योपनिषद् को बहुत गहन माना जाता रहा है। इसका पहला मंत्र ॐकार की सार्वभौमिकता बताता है।

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