गणपत्यथर्वशीर्ष गणेश की स्तुति का एक अत्यंत प्राचीन और गहन स्तोत्र है। इसके आरंभ में ही गणपति को सब कुछ बता दिया गया है — आप ही प्रत्यक्ष तत्व हैं, आप ही कर्ता (बनाने वाले), धर्ता (चलाने वाले) और हर्ता (समाप्त करने वाले) हैं।
सबसे गहरी बात है 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि' — यहाँ उपनिषद् का महावाक्य 'तत् त्वम् असि' (वह तू ही है) गणपति पर लागू किया गया है। इसका अर्थ है कि गणपति स्वयं वह परम ब्रह्म हैं जिसकी उपनिषदें बात करती हैं।
फिर कहा गया — 'त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि' — आप ही यह सब कुछ ब्रह्म हैं। और 'त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्' — आप साक्षात् नित्य आत्मा हैं। यह स्तोत्र गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है।