📿 श्लोक संग्रह

ॐ नमस्ते गणपतये

गणपत्यथर्वशीर्ष 1 पुराण स्तोत्र
📖 अथर्वशीर्ष उपनिषद् (गणपत्यथर्वशीर्ष)
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलं कर्तासि ।
त्वमेव केवलं धर्तासि ।
त्वमेव केवलं हर्तासि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ।
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥
प्रणव, परमात्मा
नमस्ते
आपको नमस्कार
गणपतये
गणों के पति (गणेश) को
त्वम् एव
आप ही
प्रत्यक्षम्
साक्षात्, प्रत्यक्ष
तत्त्वम् असि
'तत् त्वम् असि' (वह तू ही है — उपनिषद् महावाक्य)
कर्ता
रचने वाले
धर्ता
धारण करने वाले
हर्ता
संहार करने वाले
सर्वम् खलु इदम्
यह सब कुछ
ब्रह्म
ब्रह्म
साक्षात् आत्मा
साक्षात् आत्मा
नित्यम्
सदा, नित्य

गणपत्यथर्वशीर्ष गणेश की स्तुति का एक अत्यंत प्राचीन और गहन स्तोत्र है। इसके आरंभ में ही गणपति को सब कुछ बता दिया गया है — आप ही प्रत्यक्ष तत्व हैं, आप ही कर्ता (बनाने वाले), धर्ता (चलाने वाले) और हर्ता (समाप्त करने वाले) हैं।

सबसे गहरी बात है 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि' — यहाँ उपनिषद् का महावाक्य 'तत् त्वम् असि' (वह तू ही है) गणपति पर लागू किया गया है। इसका अर्थ है कि गणपति स्वयं वह परम ब्रह्म हैं जिसकी उपनिषदें बात करती हैं।

फिर कहा गया — 'त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि' — आप ही यह सब कुछ ब्रह्म हैं। और 'त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्' — आप साक्षात् नित्य आत्मा हैं। यह स्तोत्र गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है।

गणपत्यथर्वशीर्ष अथर्ववेद की उपनिषद् शैली में लिखा गया स्तोत्र है। इसमें उपनिषदों की भाषा और महावाक्यों का प्रयोग किया गया है। परंपरा में इसे गणेश की सबसे प्रामाणिक स्तुति माना जाता रहा है।

गणेश चतुर्थी और अन्य गणेश-पूजन अवसरों पर इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से प्रचलित रहा है।

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