📿 दुर्गा सप्तशती

एकादश अध्याय — नारायणी स्तुति

दुर्गा सप्तशती · 11 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥
विद्याः समस्ताः
सभी विद्याएँ
तव भेदाः
तुम्हारे ही रूप हैं
स्त्रियः समस्ताः
सभी स्त्रियाँ
त्वयैकया पूरितम्
तुम एकमात्र ने भरा है
का ते स्तुतिः
आपकी स्तुति कैसे करें
स्तव्यपरा
स्तुति के परे
हे देवी, सभी विद्याएँ तुम्हारे ही रूप हैं। जगत की सभी स्त्रियाँ तुम्हारी ही विभूतियाँ हैं। इस सम्पूर्ण जगत को तुमने अकेले भरा है। तुम्हारी स्तुति कैसे करें — तुम स्तुति के परे हो।
श्लोक 2
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी ।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमेश्वरि ॥
सर्वभूता
सभी प्राणियों में स्थित
स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी
स्वर्ग और मोक्ष देने वाली — परंपरागत वर्णन
त्वं स्तुता
तुम स्तुत्य हो
परमेश्वरि
हे परमेश्वरी
पुराण में वर्णित है कि देवी सभी प्राणियों में स्थित हैं और मोक्ष की देने वाली मानी जाती हैं। हे परमेश्वरी, हम आपकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 3
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
शरणागत
शरण में आए हुए
दीनार्त
दीन और पीड़ित
परित्राण परायणे
रक्षा करने में तत्पर
सर्वस्यार्तिहरे
सभी की पीड़ा हरने वाली
नारायणि नमोऽस्तु ते
हे नारायणी, आपको नमस्कार
शरण में आए हुए दीन-पीड़ितों की रक्षा करने में सदा तत्पर, सभी की पीड़ा हरने वाली, हे नारायणी — आपको नमस्कार है।
श्लोक 4
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
सृष्टिस्थितिविनाशानां
सृष्टि, स्थिति और विनाश की
शक्तिभूते
शक्ति के रूप में
सनातनि
सनातन, शाश्वत
गुणाश्रये
सभी गुणों का आश्रय
गुणमये
गुणमयी
सृष्टि, पालन और विनाश की शक्ति-स्वरूपा, सनातन, सभी गुणों का आश्रय, हे नारायणी — आपको नमस्कार है।
श्लोक 5
शरणे ऽहं प्रपन्नोऽस्मि सर्वभूतभयंकरि ।
नारायणि नमोऽस्तु ते नारायणि प्रसीद मे ॥
शरणे प्रपन्नः अस्मि
मैं शरण में आया हूँ
सर्वभूतभयंकरि
सभी में भय उत्पन्न करने वाली — अर्थात् सभी की शक्ति-स्वरूपा
प्रसीद मे
मुझ पर प्रसन्न होओ
हे नारायणी, मैं आपकी शरण में हूँ। आप सभी में विद्यमान हैं। मुझ पर कृपादृष्टि रखें।
श्लोक 6
एभिः स्तवैश्च मां देवि स्तुतां वन्दितुमर्हसि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
एभिः स्तवैः
इन स्तोत्रों से
स्तुताम्
स्तुत्य
वन्दितुम् अर्हसि
वंदनीय हो
रूपं देहि
शक्ति प्रदान करो
जयं देहि
विजय प्रदान करो
यशो देहि
यश प्रदान करो
द्विषो जहि
शत्रुओं का नाश करो — परंपरागत प्रार्थना
हे देवी, इन स्तोत्रों से आप स्तुत्य हैं। शक्ति, विजय और यश — ये परंपरागत रूप से आपसे माँगी जाने वाली कृपाएँ हैं।
श्लोक 7
देव्युवाच ।
वरदाहं सुरश्रेष्ठा वरं वृणुत सुव्रताः ।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय किं करोमि ब्रवीत मे ॥
वरदा अहम्
मैं वरदान देने वाली हूँ
सुरश्रेष्ठाः
हे देवश्रेष्ठो
वरं वृणुत
वरदान माँगो
सुव्रताः
हे सुव्रतधारियो
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय
तीनों लोकों के कल्याण के लिए
देवी ने कहा — हे देवताओ, मैं वरदान देने को तत्पर हूँ। तीनों लोकों के कल्याण के लिए जो चाहते हो, माँगो।
श्लोक 8
देवा ऊचुः ।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यम् अस्माकं हितकाम्यया ॥
सर्वाबाधाप्रशमनम्
सभी बाधाओं का शमन
त्रैलोक्यस्य
तीनों लोकों की
अखिलेश्वरि
हे सर्वेश्वरी
हितकाम्यया
हमारे कल्याण की इच्छा से
देवताओं ने कहा — हे सर्वेश्वरी, तीनों लोकों की सभी बाधाएँ दूर करना ही हमारी प्रार्थना है।
श्लोक 9
देव्युवाच ।
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यौ जन्मनः प्राप्स्यतो ऽसुरौ ॥
वैवस्वतेऽन्तरे
वैवस्वत मन्वंतर में
अष्टाविंशतिमे युगे
अट्ठाईसवें युग में
शुम्भः निशुम्भः
शुम्भ और निशुम्भ
जन्मनः प्राप्स्यतः
फिर जन्म लेंगे
असुरौ
असुर रूप में
देवी ने भविष्यवाणी की — भविष्य में शुम्भ और निशुम्भ फिर जन्म लेंगे। उस समय भी मैं प्रकट होऊँगी।
श्लोक 10
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
तत्र त्वामर्चयिष्यन्ति मनुजाः पुण्यकर्मिणः ॥
नन्दगोपगृहे जाता
नंद गोप के घर जन्म लेकर
यशोदागर्भसम्भवा
यशोदा माँ के गर्भ से
तत्र अर्चयिष्यन्ति
वहाँ पूजी जाऊँगी
पुण्यकर्मिणः
पुण्यकर्मी मनुष्य
देवी ने बताया — भविष्य में मैं नंदगोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी और पुण्यकर्मी मनुष्य मेरी पूजा करेंगे।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, एकादश अध्याय नारायणी स्तुति है — दुर्गा सप्तशती का सबसे मधुर और गहरा अध्याय। यहाँ देवताओं ने देवी की स्तुति की। 'शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे' — शरण में आए दीन-पीड़ितों की रक्षा करने वाली — यह पंक्ति देवी की करुणा का सर्वश्रेष्ठ वर्णन है।

इस अध्याय में देवी ने भविष्यवाणी की — वे नंद-यशोदा के घर जन्म लेंगी। यह भविष्यवाणी योगमाया के भविष्य अवतार की ओर संकेत करती है।

नारायणी स्तुति परंपरागत रूप से नवरात्रि में भक्तों द्वारा पढ़ी जाती है। इसमें देवी को सृष्टि, पालन और विनाश की शक्ति, सभी विद्याओं का स्रोत और सभी स्त्रियों की मूल शक्ति बताया गया है।

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