📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
देव्युवाच ।
पाठाद् ध्यानाद् इदं माहात्म्यं श्रोष्यति च समाहितः ।
तस्य सर्वाणि पापानि मत्प्रसादाद् भविष्यन्ति ॥
पाठाद् ध्यानाद्
पाठ और ध्यान से
इदं माहात्म्यम्
यह महात्म्य
श्रोष्यति समाहितः
एकाग्र होकर सुनेगा
मत्प्रसादाद्
मेरी कृपा से — पारंपरिक वर्णन
देवी ने कहा — जो इस महात्म्य का पाठ और ध्यान करेगा, परंपरा में मेरी कृपा का वर्णन आता है।
श्लोक 2
न मे प्रियतरं किञ्चिद् इह लोके परत्र च ।
यस्मिन् देशे ऽपि पठ्यते मन्महात्म्यमिदं सदा ॥
न मे प्रियतरम्
मुझे और कुछ उतना प्रिय नहीं
इह लोके परत्र च
इस लोक में और परलोक में
मन्महात्म्यम्
मेरा यह महात्म्य
सदा पठ्यते
सदा पढ़ा जाता है
देवी ने कहा — जिस स्थान पर यह महात्म्य पढ़ा जाता है, वह स्थान मुझे अत्यंत प्रिय है।
श्लोक 3
तत्र सन्निधिमात्रेण मम तेजः समागतम् ।
न क्षुधा न च पिपासा नाऽऽलस्यं तत्र जायते ॥
सन्निधिमात्रेण
निकटता मात्र से
न क्षुधा न पिपासा
न भूख न प्यास — पारंपरिक वर्णन
पुराण में वर्णित है कि देवी के महात्म्य-पाठ की निकटता में उनका तेज प्रकट होता है।
श्लोक 4
पूजयिष्यन्ति ये भक्त्या मां भवित्री च मे प्रिया ।
त्रिभिः सप्तभिर्दिनैर्वापि माहात्म्यं श्रुणोति यः ॥
पूजयिष्यन्ति भक्त्या
भक्तिपूर्वक पूजेंगे
भवित्री मे प्रिया
मुझे प्रिय होगी
त्रिभिः सप्तभिः दिनैः
तीन या सात दिनों में
माहात्म्यं श्रुणोति
महात्म्य सुनता है
देवी ने बताया — जो भक्तिपूर्वक तीन या सात दिनों में महात्म्य सुनते हैं, वे मुझे प्रिय हैं।
श्लोक 5
इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवी दैव्यं रूपमास्थिता ।
देवास्ते विस्मिताः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ॥
दैव्यं रूपम् आस्थिता
दिव्य रूप धारण करके
विस्मिताः सर्वे
सभी चकित रह गए
हर्षनिर्भरमानसाः
आनंद से भरे हृदय से
यह कहकर देवी अंतर्धान हो गईं। सभी देवता आनंद और विस्मय से भर गए।
श्लोक 6
पुनर्वन्दे महादेवीं या कृपाऽऽत्मनः शर्मदा ।
भक्तानुग्रहकर्त्री च नित्यं स्यात् सुखदा सदा ॥
पुनः वन्दे
पुनः नमन करता हूँ
भक्तानुग्रहकर्त्री
भक्तों पर अनुग्रह करने वाली
ऋषि ने महादेवी को पुनः नमन किया — कृपालु, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली, सुखदायिनी।
श्लोक 7
इदं माहात्म्यं विधिना प्रदाता परमेश्वरी ।
श्रोता भक्तः समाहितः शृणोति यन्महात्मनाम् ॥
इदं माहात्म्यम्
यह महात्म्य
परमेश्वरी
परमेश्वरी देवी का
श्रोता भक्तः
सुनने वाला भक्त
परमेश्वरी देवी का यह महात्म्य विधिपूर्वक और एकाग्रता से सुनने की परंपरा रही है।
श्लोक 8
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्म्याः ।
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा ।
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥
सुकृतिनां भवनेषु
पुण्यवानों के घरों में
पापात्मनां हृदयेषु बुद्धिः
पाप से बचाने वाली बुद्धि
श्रद्धा सतां
सज्जनों की श्रद्धा
परिपालय विश्वम्
विश्व की रक्षा करो
जो पुण्यवानों के घरों में लक्ष्मी हैं, सज्जनों की श्रद्धा हैं, कुलजनों की मर्यादा हैं — हे देवी, उन आपको हम नमन करते हैं। विश्व की रक्षा करें।
संदर्भ
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, द्वादश अध्याय में देवी ने महात्म्य की महिमा स्वयं बताई। उन्होंने कहा — जिस स्थान पर यह महात्म्य पढ़ा जाएगा, वह मुझे प्रिय है।
इस अध्याय का अंतिम श्लोक — 'या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेषु' — देवी को लक्ष्मी, श्रद्धा, बुद्धि और मर्यादा सभी के रूप में बताता है। यह दुर्गा सप्तशती की सर्वसमावेशी दृष्टि का सार है।
दुर्गा सप्तशती · 12 / 13