📿 दुर्गा सप्तशती

त्रयोदश अध्याय — सुरथ-वैश्य उपाख्यान

दुर्गा सप्तशती · 13 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
मेधा उवाच ।
राजन् किमेवं त्वमिमां कथां तु श्रृणोषि दुःखस्य निमित्तभूताम् ।
तस्याश्चोत्पत्तिकथां शृणुष्व यया चिरं तव दुःखमेति ॥
मेधा उवाच
मेधा ऋषि ने कहा
राजन्
हे राजन्
इमां कथाम्
इस कथा को
दुःखस्य निमित्तभूताम्
दुःख का कारण बनने वाली
शृणुष्व
सुनो
मेधा ऋषि ने राजा सुरथ और वैश्य समाधि से कहा — हे राजन्, यह कथा सुनो जो तुम्हारे दुःख का कारण बताएगी।
श्लोक 2
राजा सुरथस्तु ततः सहैव वैश्येन मेधामुनिमाश्रितः ।
शुश्राव देवीमाहात्म्यं विधिवत् सुसमाहितः ॥
राजा सुरथः
राजा सुरथ
वैश्येन सह
वैश्य के साथ
मेधामुनिम् आश्रितः
मेधा मुनि के आश्रम में
देवीमाहात्म्यम्
देवी का महात्म्य
विधिवत् सुसमाहितः
विधिपूर्वक और एकाग्र होकर
राजा सुरथ और वैश्य समाधि — दोनों ने मेधा मुनि के आश्रम में एकाग्रता से देवी महात्म्य सुना।
श्लोक 3
राजा ऽपि वैश्यश्च स तावुभौ तां पूजयन्तौ नियताहारौ ।
वर्षमेकं तपस्तप्त्वा देव्याः प्रसन्नतामापतुः ॥
उभौ तौ
वे दोनों
पूजयन्तौ
पूजा करते हुए
नियताहारौ
नियमित आहार से
वर्षम् एकम् तपः तप्त्वा
एक वर्ष तप करके
देव्याः प्रसन्नताम् आपतुः
देवी की कृपा के पात्र बने
दोनों ने एक वर्ष तक नियमित पूजा और तप किया। पारंपरिक कथा में देवी उनसे प्रसन्न हुईं।
श्लोक 4
देव्युवाच ।
यत्प्रार्थितं त्वया राजन् तद् ददामि मनोगतम् ।
वैश्य वरं च वृणुष्व यत् तुभ्यं मनसेप्सितम् ॥
यत् प्रार्थितम्
जो माँगा है
राजन्
हे राजन्
मनोगतम्
मनोकामना
वैश्य वरं वृणुष्व
हे वैश्य, तुम भी वरदान माँगो
मनसेप्सितम्
मन में जो चाहो
देवी ने कहा — हे राजन्, हे वैश्य, अपनी-अपनी मनोकामना बताओ।
श्लोक 5
राजोवाच ।
नष्टं राज्यं पुनर्देहि शत्रुभिः परिमर्दितम् ।
ममाज्ञां देवि संप्राप्य यदि मे भविता श्रुतिः ॥
नष्टं राज्यम्
खोया हुआ राज्य
पुनः देहि
वापस दो
शत्रुभिः परिमर्दितम्
शत्रुओं से जो छिन गया
ममाज्ञाम्
मेरी प्रार्थना से
श्रुतिः
आज्ञा
राजा सुरथ ने माँगा — हे देवी, शत्रुओं से छिना मेरा राज्य वापस दिला दें।
श्लोक 6
वैश्य उवाच ।
विरक्तिं परमां देहि ज्ञानमात्मनि चेश्वरि ।
यया ज्ञातव्यमखिलं जानीयां तत्त्वमात्मनि ॥
विरक्तिं परमाम्
परम वैराग्य
ज्ञानम् आत्मनि
आत्मज्ञान
यया ज्ञातव्यम् अखिलम्
जिससे सब कुछ जाना जाए
तत्त्वम् आत्मनि
आत्म-तत्त्व
वैश्य समाधि ने माँगा — हे देवी, मुझे वैराग्य और आत्मज्ञान दें। जिससे जीवन का तत्त्व जान सकूँ।
श्लोक 7
देव्युवाच ।
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यसे पुनः ।
हत्वा रिपून् समग्रांश्च भोक्ष्यसे तन्महीपते ॥
स्वल्पैः अहोभिः
थोड़े ही दिनों में
नृपते
हे राजन्
स्वं राज्यम् प्राप्स्यसे
अपना राज्य पाओगे — देवी का वचन
रिपून् हत्वा
शत्रुओं को परास्त करके
भोक्ष्यसे
उपभोग करोगे
देवी ने राजा को आश्वासन दिया — शत्रुओं को परास्त करके तुम अपना राज्य पुनः प्राप्त करोगे।
श्लोक 8
इत्युक्त्वाऽन्तर्हिता देवी प्रसन्नवदनाम्बुजा ।
राजा प्राप ततः स्वं तु राज्यं वैश्योऽपि तत्त्ववित् ॥
अन्तर्हिता देवी
देवी अंतर्धान हो गईं
प्रसन्नवदनाम्बुजा
प्रसन्न कमल-मुखी
राजा प्राप स्वं राज्यम्
राजा ने अपना राज्य पाया — पारंपरिक वर्णन
वैश्यः तत्त्ववित्
वैश्य तत्त्वज्ञानी हुआ
प्रसन्नमुखी देवी अंतर्धान हुईं। पारंपरिक कथा में राजा ने राज्य और वैश्य ने ज्ञान प्राप्त किया। यह दुर्गा सप्तशती की उपसंहार-कथा है।
श्लोक 9
इदं माहात्म्यं भगवत्याः पठेद् यः श्रृणुयाच्च यः ।
श्रावयेद् वा समाहित्यं भक्त्या देव्याः स्तवं सदा ॥
इदं माहात्म्यम्
यह महात्म्य
भगवत्याः
भगवती देवी का
पठेत् श्रृणुयात् च
पढ़े और सुने
श्रावयेत् समाहित्यम्
एकाग्र होकर सुनाए
भक्त्या देव्याः स्तवम्
भक्ति से देवी की स्तुति
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, भगवती देवी का यह महात्म्य पढ़ने, सुनने और सुनाने की परंपरा रही है।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, त्रयोदश अध्याय दुर्गा सप्तशती का उपसंहार है — सुरथ-वैश्य उपाख्यान। राजा सुरथ ने राज्य खोने के बाद और वैश्य समाधि ने परिजनों के मोह से व्याकुल होकर मेधा ऋषि के आश्रम में आश्रय लिया।

दोनों ने मिलकर देवी महात्म्य सुना और एक वर्ष तपस्या की। देवी ने राजा को राज्य और वैश्य को वैराग्य का वरदान दिया।

यह उपाख्यान बताता है कि दुर्गा सप्तशती की कथा के मूल में दो सामान्य मनुष्यों की व्याकुलता है — एक राजा जिसने राज्य खोया, एक वैश्य जिसे परिजनों ने ठुकराया। देवी दोनों की सुनती हैं।

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