📿 दुर्गा सप्तशती

दशम अध्याय — शुम्भ वध

दुर्गा सप्तशती · 10 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
शुम्भ उवाच ।
बलदर्पितेऽनेकशक्तिभिर्युद्धे त्वं न जेष्यसि ।
अन्यासां च बलं गृह्य युध्यसे मां न शोभनम् ॥
बलदर्पित
बल का अहंकार करने वाली
अनेकशक्तिभिः
अनेक शक्तियों के बल पर
अन्यासां बलम् गृह्य
दूसरों की शक्ति लेकर
न शोभनम्
यह उचित नहीं
शुम्भ ने देवी को चुनौती दी — तुम दूसरों की शक्ति लेकर लड़ती हो, यह वीरता नहीं।
श्लोक 2
देव्युवाच ।
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥
एकैव अहम्
मैं एकमात्र हूँ
द्वितीया का
दूसरी कौन है
मय्येव विशन्त्यः
मुझमें ही प्रवेश करती हुईं
मद्विभूतयः
मेरी विभूतियाँ / शक्तियाँ
देवी ने उत्तर दिया — मैं एकमात्र हूँ। ये सभी शक्तियाँ मेरी ही विभूतियाँ हैं। देखो — वे सब मुझमें समा रही हैं।
श्लोक 3
इत्युक्त्वा सा समस्तास्तु विविशुस्तत्र देवताः ।
एकैवाऽभूत् तदा देवी शुम्भं सामनसा तदा ॥
समस्ताः देवताः
सभी देवशक्तियाँ
विविशुः
प्रवेश कर गईं
एकैव अभूत्
एक ही हो गईं
शुम्भं सामनसा
शुम्भ के सामने
सभी शक्तियाँ देवी में समा गईं। वे एकमात्र, परिपूर्ण शक्ति के रूप में शुम्भ के सामने प्रकट हुईं।
श्लोक 4
प्रजज्वाल तदा देवी तेजसा परमेण सा ।
शुम्भं जघान तीक्ष्णेन शूलेन परमेश्वरी ॥
प्रजज्वाल
प्रज्वलित हो उठीं
परमेण तेजसा
परम तेज से
तीक्ष्णेन शूलेन
तीक्ष्ण शूल से
परमेश्वरी
परमेश्वरी देवी
परमेश्वरी देवी परम तेज से प्रज्वलित हो उठीं। तीक्ष्ण शूल से उन्होंने शुम्भ को परास्त किया।
श्लोक 5
स पपात धरां तेन शुम्भो दैत्यपुंगवः ।
रसातलं गतो नष्टः पुनर्नोद्भूत संभवः ॥
पपात धराम्
धरती पर गिर पड़ा
दैत्यपुंगवः
दैत्यों में श्रेष्ठ
रसातलं गतः
रसातल को गया
पुनः न उद्भूत
फिर उत्पन्न नहीं हुआ
शुम्भ धरती पर गिरा। वह फिर उत्पन्न नहीं हुआ। देवी की विजय हुई।
श्लोक 6
ततो देवाः सर्वे प्रमुदिताश्चुक्रुशुर्जयम् ।
दिव्यं पुष्पवर्षं ववर्ष नभो ऽम्बरम् ॥
प्रमुदिताः
प्रसन्न
चुक्रुशुः जयम्
जयकार किया
दिव्यं पुष्पवर्षम्
दिव्य पुष्प-वर्षा
नभः अम्बरम्
आकाश से
सभी देवता प्रसन्न होकर जयकार करने लगे। आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई।
श्लोक 7
इति तस्यास्तदा देव्याः स विजयः कथ्यते नृणाम् ।
श्रुणुयात् प्रयतो यस्तु सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥
इति तस्याः देव्याः विजयः
यह देवी की विजय
कथ्यते
कही जाती है
श्रुणुयात् प्रयतः
श्रद्धा से सुने
सर्वसिद्धिम् अवाप्नुयात्
पारंपरिक मान्यता में सर्वसिद्धि
यह देवी की विजय की कथा है। परंपरा में इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ा और सुना जाता है।
श्लोक 8
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः ।
मानवः सुखमाप्नोति देव्याः प्रसादतो नृणाम् ॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तः
सभी बाधाओं से मुक्त
धनधान्यसमन्वितः
धन-धान्य से युक्त
देव्याः प्रसादतः
देवी की कृपा से
सुखम् आप्नोति
सुख प्राप्त होता है — पारंपरिक वर्णन
पुराण में वर्णित है कि देवी की कृपा से भक्त बाधाओं से मुक्त होकर सुख पाता है। यह पाठ की परंपरागत महिमा है।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, दशम अध्याय शुम्भ वध की कथा है। शुम्भ ने देवी को चुनौती दी कि वे दूसरों की शक्ति से लड़ती हैं। देवी ने उत्तर दिया — ये सब शक्तियाँ मेरी ही विभूतियाँ हैं। सब उनमें समा गईं।

परमेश्वरी ने शूल से शुम्भ को परास्त किया। तीनों लोकों में आनंद छा गया। यह मध्यम चरित्र का अंत है।

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