📿 दुर्गा सप्तशती

नवम अध्याय — निशुम्भ वध

दुर्गा सप्तशती · 9 / 13
📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
ततः शुम्भो निशुम्भश्च हतानीक्ष्य महाचमूः ।
क्रोधसंरक्तनयनौ देव्याः शक्तिमभिद्रुतौ ॥
हतानीक्ष्य
सेना का विनाश देखकर
क्रोधसंरक्तनयनौ
क्रोध से लाल आँखों वाले
देव्याः शक्तिम्
देवी की ओर
अभिद्रुतौ
दौड़े
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, सेना के विनाश को देखकर शुम्भ और निशुम्भ — दोनों क्रोधित होकर देवी की ओर दौड़े।
श्लोक 2
निशुम्भो ऽत्यन्तसंक्रुद्धः सुप्रज्वलितलोचनः ।
शक्तिमाहत्य देवीं च जघान परमाहवे ॥
अत्यन्तसंक्रुद्धः
अत्यंत क्रोधित
सुप्रज्वलितलोचनः
प्रज्वलित नेत्रों वाला
शक्तिम् आहत्य
शक्ति-अस्त्र से प्रहार करके
परमाहवे
इस प्रचंड युद्ध में
निशुम्भ ने देवी पर शक्ति-अस्त्र से प्रहार किया। किंतु देवी की शक्ति उससे कहीं अधिक थी।
श्लोक 3
सा चिच्छेद महादेवी शूलेनैव त्रिशूलिनी ।
निशुम्भस्य शिरो देव्या निपातयत महाहवे ॥
चिच्छेद
काट दिया
महादेवी त्रिशूलिनी
त्रिशूलधारी महादेवी
निशुम्भस्य शिरः
निशुम्भ का शिर
निपातयत्
गिरा दिया
महादेवी ने त्रिशूल से निशुम्भ को परास्त किया।
श्लोक 4
हते निशुम्भे दैत्येन्द्रे देव्या खड्गेन चण्डिका ।
शुम्भस्य बलमाहत्य समपोहद्रणाजिरात् ॥
हते निशुम्भे
निशुम्भ के परास्त होने पर
देव्या खड्गेन
देवी के खड्ग से
शुम्भस्य बलम्
शुम्भ की सेना
रणाजिरात् अपोहत्
रणभूमि से भाग गई
निशुम्भ के परास्त होने पर शुम्भ की बची हुई सेना भाग गई।
श्लोक 5
देवाः स्तोत्रं प्रचक्रुस्तु देव्याः प्रसन्नचेतसः ।
पुष्पवृष्टिं च कुर्वन्ति स्म जयशब्दं ददुस्तदा ॥
स्तोत्रं प्रचक्रुः
स्तुति की
प्रसन्नचेतसः
प्रसन्न चित्त से
पुष्पवृष्टिम् कुर्वन्ति
फूलों की वर्षा की
जयशब्दम् ददुः
जयकार किया
देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी की स्तुति की। आकाश से फूलों की वर्षा हुई।
श्लोक 6
ततः प्रसन्नवदना देवी लोकहितंकरी ।
उवाच वाचं मधुरां तानां देवान् प्रहर्षिता ॥
प्रसन्नवदना
प्रसन्न मुखमण्डल वाली
लोकहितंकरी
लोकों का कल्याण करने वाली
वाचं मधुराम्
मधुर वाणी
प्रहर्षिता
आनंदित
देवी का मुख प्रसन्न था। उन्होंने देवताओं से मधुर वाणी में कहा।
श्लोक 7
वरं वृणुध्वं देवेशा यद् वाञ्छितमिहानघाः ।
ददामि वो महाभागाः परितुष्टा ऽस्मि वः सदा ॥
वरं वृणुध्वं
वरदान माँगो
देवेशाः
हे देवताओ
यद् वाञ्छितम्
जो चाहते हो
परितुष्टा
पूर्णतः संतुष्ट
सदा
सदा
देवी ने देवताओं से कहा — हे देवताओ, जो चाहो माँगो। मैं आप सबसे प्रसन्न हूँ।
श्लोक 8
देवा ऊचुः ।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥
सर्वाबाधाप्रशमनम्
सभी बाधाओं को शांत करना
त्रैलोक्यस्य
तीनों लोकों की
अखिलेश्वरि
हे सर्वेश्वरी
अस्मद्वैरिविनाशनम्
हमारे शत्रुओं का नाश
देवताओं ने विनती की — हे सर्वेश्वरी, तीनों लोकों की सभी बाधाएँ आप दूर करती रहें।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, नवम अध्याय में निशुम्भ वध की कथा है। शुम्भ का भाई निशुम्भ अत्यंत बलशाली था। देवी ने त्रिशूल से उसे परास्त किया।

निशुम्भ के पतन के बाद शुम्भ की सेना भाग गई। देवताओं ने जय-जयकार किया और देवी ने वरदान देने की इच्छा प्रकट की।

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