📖 मार्कंडेय पुराण — दुर्गा सप्तशती
श्लोक 1
रक्तबीजो महावीर्यो महासुरवरो बली ।
रक्तबिन्दोः समुत्पन्नः प्रत्येकं रक्तबिन्दुतः ॥
रक्तबीजः
रक्तबीज — रक्त के बीज वाला
रक्तबिन्दोः समुत्पन्नः
रक्त की प्रत्येक बूँद से उत्पन्न होने वाला
प्रत्येकं
प्रत्येक बूँद से
रक्तबीज एक विशेष वरदान-प्राप्त दैत्य था। उसकी रक्त की प्रत्येक बूँद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था।
श्लोक 2
देवाः सर्वे रक्तबीजस्य वध्यन्ते रक्तवृद्धितः ।
तमुवाच तदा देवी चण्डिका कोपसंयुता ॥
रक्तवृद्धितः
रक्त के बढ़ने से
रक्त की बूँदों से बार-बार नए दैत्य उत्पन्न होने लगे। देवता विचलित हो गए। देवी चण्डिका क्रोधित हुईं।
श्लोक 3
चामुण्डे विस्तृतास्यां त्वं पिब रक्तमशेषतः ।
मम वज्रहतस्याशु रक्तबिन्दोः समुद्गताः ॥
विस्तृतास्याम्
मुख को फैलाकर
पिब रक्तम् अशेषतः
सारा रक्त पी लो
वज्रहतस्य
वज्र से प्रहार किए जाने पर
रक्तबिन्दोः
रक्त की बूँदों को
देवी चण्डिका ने चामुण्डा से कहा — हे चामुण्डे, मुख फैलाओ और रक्त की प्रत्येक बूँद पी लो, जिससे नया दैत्य उत्पन्न न हो।
श्लोक 4
इत्युक्त्वा सा तदाऽत्यर्थं देवी शुलमुद्यम्य ।
रक्तबीजं हतं तेन वज्रेण समपातयत् ॥
रक्तबीजं हतम्
रक्तबीज को प्रहार किया
देवी ने शूल उठाकर रक्तबीज पर प्रहार किया। चामुण्डा ने रक्त की प्रत्येक बूँद पी ली।
श्लोक 5
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसंघैर्विदारितः ।
नीरक्तश्च महावीर्यः रक्तबीजो महासुरः ॥
महीपृष्ठे पपात
धरती पर गिर पड़ा
शस्त्रसंघैः विदारितः
अनेक शस्त्रों से घायल
नीरक्तः
रक्तहीन — सारा रक्त पीने के बाद
रक्त की एक भी बूँद धरती पर न पड़ने दी। रक्तबीज रक्तहीन होकर धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 6
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
बभूवुस्ते महादेव्याः स्तोत्रं चक्रुः प्रहर्षिताः ॥
हर्षनिर्भरमानसाः
आनंद से भरे हृदय से
प्रहर्षिताः
अत्यंत प्रसन्न
सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने महादेवी की स्तुति की।
श्लोक 7
महादेवी महाभागा देवानां च हितंकरी ।
विजयस्व महादेवी लोकानां हितकारिणि ॥
देवानां हितंकरी
देवताओं का कल्याण करने वाली
लोकानां हितकारिणि
सभी लोकों का कल्याण करने वाली
देवताओं ने कहा — हे महादेवी, आप सभी लोकों का कल्याण करने वाली हैं। आपकी जय हो।
श्लोक 8
यस्याः प्रभावमतुलं भगवान् वेद नो हरः ।
तथाऽपि स्तूयसे देवि यथाशक्ति मयाऽधुना ॥
यस्याः प्रभावम् अतुलम्
जिनका प्रभाव अतुलनीय है
भगवान् हरः न वेद
भगवान शिव भी पूरी तरह नहीं जानते
यथाशक्ति
जितनी शक्ति है उतनी
देवता बोले — हे देवी, आपका प्रभाव इतना अतुलनीय है कि भगवान शिव भी उसे पूरी तरह नहीं जानते। हम अपनी शक्ति के अनुसार आपकी स्तुति करते हैं।
संदर्भ
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, अष्टम अध्याय रक्तबीज वध की अद्भुत कथा है। रक्तबीज को वरदान था कि उसकी रक्त की प्रत्येक बूँद से नया दैत्य उत्पन्न होगा। देवी ने चामुण्डा को आज्ञा दी कि रक्त की एक बूँद भी धरती पर न पड़े।
चामुण्डा ने सारा रक्त पी लिया। इस प्रकार रक्तबीज रक्तहीन होकर परास्त हुआ। यह कथा देवी की अजेय बुद्धि और रणनीति का परिचय देती है।
दुर्गा सप्तशती · 8 / 13