📿 श्लोक संग्रह

यथाकाशस्थितो नित्यं

गीता 9.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
यथा
जैसे
आकाशस्थितः
आकाश में रहने वाली
नित्यं
सदा, हमेशा
वायुः
हवा, पवन
सर्वत्रगः
सब जगह जाने वाली
महान्
विशाल
तथा
वैसे ही
सर्वाणि भूतानि
सभी प्राणी
मत्स्थानि
मुझमें स्थित
उपधारय
जान लो, समझो

यहाँ कृष्ण एक सुंदर उदाहरण देते हैं। हवा कितनी भी बड़ी हो, वह आकाश में ही रहती है — आकाश उसे थामे रखता है। वैसे ही सभी प्राणी — छोटे-बड़े, सुंदर-कुरूप — सभी मुझमें ही स्थित हैं।

यह उपमा बड़ी सटीक है। वायु आकाश को नहीं बाँधती, आकाश वायु को नहीं रोकता — दोनों अपने-अपने स्वभाव में हैं, फिर भी वायु का अस्तित्व आकाश के बिना नहीं। परमात्मा और जीव का रिश्ता ऐसा ही है।

9.6 में कृष्ण 9.4-9.5 की दार्शनिक बात को एक रोज़मर्रा की उपमा में बदल देते हैं। हवा और आकाश का यह उदाहरण गीता की सबसे यादगार उपमाओं में से एक है।

तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1) में 'आकाश से वायु उत्पन्न होती है' — यही क्रम यहाँ भी प्रकारांतर से आया है।

अध्याय 9 · 6 / 34
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