कृष्ण कहते हैं — कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। और जब नया कल्प आता है, तो मैं उन्हें फिर से प्रकट करता हूँ। यह सृष्टि का अनंत चक्र है।
जैसे रात को सब सो जाते हैं और सुबह फिर जग जाते हैं — कल्प का यह क्रम उसी तरह का है, पर बहुत बड़े पैमाने पर। न कुछ नष्ट होता है, न कुछ नया बनता है — बस प्रकट होने और लीन होने का क्रम चलता है।