📿 श्लोक संग्रह

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य

गीता 9.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
प्रकृतिं स्वाम्
अपनी प्रकृति को
अवष्टभ्य
थामकर, आश्रय लेकर
विसृजामि
प्रकट करता हूँ
पुनः पुनः
बार-बार
भूतग्रामम्
प्राणि-समूह को
इमं कृत्स्नम्
यह सारा
अवशं
विवश, परतंत्र
प्रकृतेर्वशात्
प्रकृति के वश से

कृष्ण कहते हैं — मैं अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर इस सारे प्राणि-समूह को बार-बार प्रकट करता हूँ। ये सब प्राणी प्रकृति के वश में हैं — स्वयं की इच्छा से नहीं आते।

यह श्लोक बताता है कि जन्म-मृत्यु का यह चक्र किसी की सज़ा नहीं है — यह बस प्रकृति का स्वभाव है। जब तक जीव प्रकृति से ऊपर नहीं उठता, वह इस चक्र में रहता है।

9.7 में 'कल्प का चक्र' बताया, 9.8 में उसका तरीका। 'अवशं प्रकृतेर्वशात्' — यह वाक्यांश बताता है कि प्राणी प्रकृति-परतंत्र हैं, पर कृष्ण प्रकृति से परे हैं।

गीता के अध्याय 13 (13.21) में भी यही भाव है — प्रकृति कार्य-कारण की जननी है, पुरुष भोग का कारण।

अध्याय 9 · 8 / 34
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