कृष्ण कहते हैं — यह सारा जगत् मेरे अदृश्य रूप से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं — जैसे आकाश में सब कुछ समाया हुआ है। पर आकाश किसी एक चीज़ में नहीं होता।
यह एक गहरी बात है। कृष्ण दोनों एक साथ कह रहे हैं — 'सब मुझमें हैं, पर मैं सब में नहीं हूँ।' यानी परमात्मा का विस्तार है, पर वे किसी एक वस्तु में सीमित नहीं होते।