📿 श्लोक संग्रह

मया ततमिदं सर्वं

गीता 9.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
मया
मेरे द्वारा
ततम्
व्याप्त है, फैला है
इदं सर्वं
यह सब कुछ
जगत्
संसार
अव्यक्तमूर्तिना
अदृश्य रूप से
मत्स्थानि
मुझमें स्थित
सर्वभूतानि
सभी प्राणी
न च अहं
और मैं नहीं
तेषु अवस्थितः
उनमें नहीं रहता

कृष्ण कहते हैं — यह सारा जगत् मेरे अदृश्य रूप से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं — जैसे आकाश में सब कुछ समाया हुआ है। पर आकाश किसी एक चीज़ में नहीं होता।

यह एक गहरी बात है। कृष्ण दोनों एक साथ कह रहे हैं — 'सब मुझमें हैं, पर मैं सब में नहीं हूँ।' यानी परमात्मा का विस्तार है, पर वे किसी एक वस्तु में सीमित नहीं होते।

9.4 और 9.5 एक साथ पढ़ने से अर्थ स्पष्ट होता है। यहाँ 'व्याप्ति' और 'अनवस्थिति' की एक साथ बात कही गई है — यह गीता का सबसे गहरा विरोधाभास है।

ईशोपनिषद् के पहले मंत्र में भी यही कहा गया है — 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — ईश्वर से सब कुछ व्याप्त है। वही भाव यहाँ गीता में आता है।

अध्याय 9 · 4 / 34
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