📿 श्लोक संग्रह

समोऽहं सर्वभूतेषु

गीता 9.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
समः अहम्
मैं समान हूँ
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
न मे द्वेष्यः
मेरा कोई द्वेषी नहीं
न प्रियः
न कोई प्रिय
ये भजन्ति
जो भजते हैं
माम् भक्त्या
मुझे भक्ति से
मयि ते
वे मुझमें हैं
तेषु च अपि अहम्
और मैं उनमें भी हूँ

भगवान कहते हैं — मैं सब प्राणियों में समान हूँ। मेरा कोई शत्रु नहीं, कोई विशेष प्रिय नहीं। सूर्य जैसे सबको प्रकाश देता है — उसे कोई छोटा-बड़ा नहीं लगता — वैसे ही भगवान सबके लिए समान हैं।

फिर भी — जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ। यह भेद कैसे? — भेद भक्त के भाव में है, भगवान की दृष्टि में नहीं। जो पास आता है, उसे पास का अनुभव होता है।

यह श्लोक गीता की समता और भक्ति — दोनों की बात एक साथ करता है। भगवान की समदृष्टि (5.18-19) और भक्त के साथ उनका आत्मीय संबंध — दोनों यहाँ एक साथ दिखते हैं।

परंपरा में 'मयि ते तेषु चाप्यहम्' को भक्त और भगवान के अभेद का संकेत माना जाता रहा है। उपनिषदों में जो 'तत्त्वमसि' की अनुभूति है — वह भक्तिमार्ग में इसी रूप में प्रकट होती है।

अध्याय 9 · 29 / 34
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