भगवान कहते हैं — मैं सब प्राणियों में समान हूँ। मेरा कोई शत्रु नहीं, कोई विशेष प्रिय नहीं। सूर्य जैसे सबको प्रकाश देता है — उसे कोई छोटा-बड़ा नहीं लगता — वैसे ही भगवान सबके लिए समान हैं।
फिर भी — जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ। यह भेद कैसे? — भेद भक्त के भाव में है, भगवान की दृष्टि में नहीं। जो पास आता है, उसे पास का अनुभव होता है।