भगवान 9.27 की बात का परिणाम बताते हैं। जब हर काम भगवान को अर्पित हो जाता है — तो उस कर्म का शुभ या अशुभ फल हमें नहीं बाँधता। क्योंकि फल की कामना ही नहीं है।
'संन्यासयोगयुक्तात्मा' — संन्यास यहाँ कपड़े छोड़ना नहीं है, कर्म के फल को छोड़ना है। यह मन की अवस्था है। ऐसा मन जो सब कुछ भगवान पर छोड़ दे — वह मुक्त है।