📿 श्लोक संग्रह

शुभाशुभफलैरेवं

गीता 9.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
शुभाशुभफलैः
शुभ-अशुभ फलों से
एवम्
इस प्रकार
मोक्ष्यसे
मुक्त होगे
कर्मबन्धनैः
कर्मों के बंधनों से
संन्यासयोगयुक्तात्मा
संन्यास-योग में युक्त मन वाला
विमुक्तः
पूर्णतः मुक्त
माम् उपैष्यसि
मुझे प्राप्त होगे

भगवान 9.27 की बात का परिणाम बताते हैं। जब हर काम भगवान को अर्पित हो जाता है — तो उस कर्म का शुभ या अशुभ फल हमें नहीं बाँधता। क्योंकि फल की कामना ही नहीं है।

'संन्यासयोगयुक्तात्मा' — संन्यास यहाँ कपड़े छोड़ना नहीं है, कर्म के फल को छोड़ना है। यह मन की अवस्था है। ऐसा मन जो सब कुछ भगवान पर छोड़ दे — वह मुक्त है।

यह श्लोक गीता 3.9 — 'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' — की भावना को आगे बढ़ाता है। कर्म बंधन बनता है जब फल की इच्छा होती है — अर्पण से वह बंधन टूटता है।

परंपरा में 'संन्यासयोग' को गृहस्थ के लिए भी सुलभ माना गया है। घर में रहकर भी, कर्म करते हुए भी — भाव से संन्यास संभव है।

अध्याय 9 · 28 / 34
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