📿 श्लोक संग्रह

यत्करोषि यदश्नासि

गीता 9.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
यत् करोषि
जो करते हो
यत् अश्नासि
जो खाते हो
यत् जुहोषि
जो यज्ञ में देते हो
ददासि यत्
जो दान देते हो
यत् तपस्यसि
जो तप करते हो
कौन्तेय
हे कुंती-पुत्र
तत् कुरुष्व
वह करो
मदर्पणम्
मुझे अर्पित करते हुए

भगवान यहाँ सबसे सरल और सबसे गहरा उपाय बताते हैं। वे कहते हैं — जो भी करो — खाना हो, यज्ञ हो, दान हो, तप हो — उसे मुझे अर्पण करते हुए करो। बस इतना काफी है।

इस एक श्लोक में पूरा कर्मयोग समा जाता है। अलग से भक्ति के लिए समय निकालने की जरूरत नहीं — हर काम को भगवान को समर्पित करना ही भक्ति है।

यह श्लोक गीता 3.9 और 4.24 की भावना का विस्तार है जहाँ 'यज्ञार्थ कर्म' — भगवान के लिए कर्म — की बात की गई है। यहाँ उसे और सरल शब्दों में कहा गया है।

परंपरा में इस श्लोक को 'समर्पण-योग' का मूल माना जाता रहा है। हर क्रिया को अर्पण बनाने की यह साधना सभी के लिए सुलभ है — चाहे गृहस्थ हो या संन्यासी।

अध्याय 9 · 27 / 34
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