📿 श्लोक संग्रह

अहं हि सर्वयज्ञानाम्

गीता 9.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
अहम् हि
मैं ही
सर्वयज्ञानाम्
सब यज्ञों का
भोक्ता
भोग लेने वाला
प्रभुः एव
स्वामी ही
न तु
परंतु नहीं
माम् अभिजानन्ति
मुझे सही से जानते हैं
तत्त्वेन
तत्त्व से — यथार्थ रूप से
अतः च्यवन्ति
इसलिए गिरते हैं, भटकते हैं
ते
वे

भगवान 9.23 की बात आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं — सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। पर जो लोग मुझे तत्त्व से नहीं जानते, वे भटकते रहते हैं।

'तत्त्वेन' — तत्त्व से, यानी असली स्वरूप से। जैसे किसी व्यक्ति का नाम जानना एक बात है, और उनका स्वभाव गहराई से जानना दूसरी बात — वैसे ही भगवान का तत्त्वज्ञान, बाहरी पूजा से परे है।

यह श्लोक 9.23 के साथ जोड़ी बनाता है — वहाँ कहा था कि अन्य देवता-भक्त भी मुझे ही पूजते हैं; यहाँ स्पष्ट किया कि तत्त्वज्ञान के बिना वह पूजा अपूर्ण रहती है।

मुण्डकोपनिषद् में भी कहा गया है — 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' — जो ब्रह्म को तत्त्व से जानता है, वह ब्रह्म हो जाता है। यही पूर्ण ज्ञान की माँग है।

अध्याय 9 · 24 / 34
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