भगवान यहाँ एक गहरी बात कहते हैं — जो लोग श्रद्धा से अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मुझे ही पूज रहे हैं। क्योंकि सब देवताओं में भी भगवान ही हैं। श्रद्धा व्यर्थ नहीं जाती।
पर 'अविधिपूर्वकम्' — यह शब्द बताता है कि इस पूजा में पूर्ण ज्ञान नहीं है। सूर्य तक पहुँचना चाहते हैं पर दीपक को देख रहे हैं — यही सीमा है। अगला 9.24 इसकी व्याख्या करता है।