इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक बहुत ही आश्वासन भरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग एकनिष्ठ भाव से मेरा चिंतन करते हैं, उनकी सारी चिंता मैं स्वयं उठा लेता हूँ। जैसे माँ अपने छोटे बच्चे का ख़्याल रखती है — उसे खिलाती है, सुलाती है, बचाती है — वैसे ही भगवान अपने भक्तों का ध्यान रखते हैं।
यहाँ 'योगक्षेम' शब्द बड़ा सुंदर है। 'योग' का अर्थ है जो नहीं मिला है उसे पाना, और 'क्षेम' का अर्थ है जो मिला है उसकी रक्षा करना। भगवान कहते हैं — दोनों काम मैं करूँगा।
इस श्लोक में यह भी कहा गया है कि यह वचन उन भक्तों के लिए है जो 'अनन्य' हैं — अर्थात जिनका मन इधर-उधर नहीं भटकता। जैसे एक दीये की लौ जब हवा से हिलती नहीं तो स्थिर जलती है, वैसे ही स्थिर मन से की गई भक्ति का अपना विशेष स्थान है।