भगवान यहाँ वैदिक यज्ञ-मार्ग का वर्णन करते हैं। जो तीन वेदों के ज्ञाता हैं, यज्ञ करते हैं, सोमरस पीते हैं — वे पाप-मुक्त होकर स्वर्ग जाते हैं और इंद्रलोक में दिव्य सुख भोगते हैं। यह एक तथ्य है, निंदा नहीं।
'पूतपापाः' — यज्ञ केवल इच्छापूर्ति नहीं, शुद्धि का साधन भी है। पर अगले श्लोक में भगवान बताएँगे कि इस मार्ग की एक सीमा है — पुण्य समाप्त होने पर लौटना पड़ता है।