भगवान यहाँ प्रकृति के दोनों पक्षों को अपना बताते हैं। वे कहते हैं — मैं गर्मी देता हूँ, बादल को रोकता हूँ और बरसाता भी हूँ। जो जीवन देता है — अमृत — वह भी मैं हूँ। जो जीवन लेता है — मृत्यु — वह भी मैं हूँ।
'सदसत्' — जो दिखता है, वह भी मैं हूँ; जो नहीं दिखता, वह भी मैं हूँ। यह भगवान की अनंतता की बात है — वे किसी एक सीमा में नहीं बँधते। यह बुद्धि से पूरी तरह नहीं पकड़ आता, पर भाव से समझ आता है।