📿 श्लोक संग्रह

तपाम्यहमहं वर्षं

गीता 9.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
तपामि
ताप देता हूँ — गर्मी देता हूँ
अहम्
मैं
वर्षम्
वर्षा
निगृह्णामि
रोकता हूँ
उत्सृजामि
बरसाता हूँ
अमृतम्
अमृत — जीवन देने वाला
मृत्युः
मृत्यु
सत्
सत् — जो विद्यमान है
असत्
असत् — जो परे है, अव्यक्त
च अहम्
वह भी मैं हूँ

भगवान यहाँ प्रकृति के दोनों पक्षों को अपना बताते हैं। वे कहते हैं — मैं गर्मी देता हूँ, बादल को रोकता हूँ और बरसाता भी हूँ। जो जीवन देता है — अमृत — वह भी मैं हूँ। जो जीवन लेता है — मृत्यु — वह भी मैं हूँ।

'सदसत्' — जो दिखता है, वह भी मैं हूँ; जो नहीं दिखता, वह भी मैं हूँ। यह भगवान की अनंतता की बात है — वे किसी एक सीमा में नहीं बँधते। यह बुद्धि से पूरी तरह नहीं पकड़ आता, पर भाव से समझ आता है।

यह श्लोक 9.16, 9.17, 9.18 की उस श्रृंखला का अंग है जहाँ भगवान अपनी सर्वव्यापकता का वर्णन करते हैं। जीवन और मृत्यु दोनों का समावेश उनमें बताया गया है।

परंपरा में 'सदसत्' की व्याख्या तैत्तिरीय उपनिषद् में मिलती है जहाँ ब्रह्म को 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' कहा गया है। 'असत्' वह है जो अनिर्वचनीय है — शब्दों के परे है।

अध्याय 9 · 19 / 34
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