📿 श्लोक संग्रह

गतिर्भर्ता प्रभुः

गीता 9.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
गतिः
गति — लक्ष्य, मार्ग
भर्ता
पालने वाला
प्रभुः
स्वामी
साक्षी
देखने वाला
निवासः
आश्रय, घर
शरणम्
शरण, रक्षक
सुहृत्
शुभचिंतक मित्र
प्रभवः
उत्पत्ति का कारण
प्रलयः
विनाश का कारण
स्थानम्
आधार, आश्रय-स्थल
निधानम्
अंतिम विश्राम-स्थल
बीजम् अव्ययम्
अविनाशी बीज

भगवान यहाँ एक के बाद एक सात शब्द कहते हैं — गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृत्। इनमें 'सुहृत्' सबसे मीठा है — वह मित्र जो बिना किसी स्वार्थ के आपका भला चाहे। भगवान स्वयं को वैसा मित्र बताते हैं।

फिर वे कहते हैं — 'बीजम् अव्ययम्' — अविनाशी बीज। जैसे एक बीज में पूरा पेड़ छुपा होता है, वैसे ही इस सारी सृष्टि का बीज भगवान हैं। और वह बीज कभी नष्ट नहीं होता — यह उनकी अनंतता की बात है।

यह श्लोक 9.17 की श्रृंखला में आता है जहाँ भगवान अपने अनेक रूपों और भूमिकाओं का वर्णन करते हैं। 'साक्षी' शब्द कठोपनिषद् और श्वेताश्वतर उपनिषद् में भी परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है।

गीता के पाँचवें अध्याय (5.29) में भगवान पहले ही कह चुके हैं — 'सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति' — मुझे सब प्राणियों का शुभचिंतक जानकर मनुष्य शांति पाता है। यह श्लोक उसी भाव को विस्तार देता है।

अध्याय 9 · 18 / 34
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