भगवान यहाँ एक के बाद एक सात शब्द कहते हैं — गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृत्। इनमें 'सुहृत्' सबसे मीठा है — वह मित्र जो बिना किसी स्वार्थ के आपका भला चाहे। भगवान स्वयं को वैसा मित्र बताते हैं।
फिर वे कहते हैं — 'बीजम् अव्ययम्' — अविनाशी बीज। जैसे एक बीज में पूरा पेड़ छुपा होता है, वैसे ही इस सारी सृष्टि का बीज भगवान हैं। और वह बीज कभी नष्ट नहीं होता — यह उनकी अनंतता की बात है।