📿 श्लोक संग्रह

राजविद्या राजगुह्यं

गीता 9.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
राजविद्या
विद्याओं का राजा
राजगुह्यं
गुह्यों में श्रेष्ठ
पवित्रम्
शुद्ध करने वाला
उत्तमम्
सर्वोत्तम
प्रत्यक्षावगमं
सीधे अनुभव से जानने योग्य
धर्म्यं
धर्म के अनुकूल
सुसुखं
बड़ी सुगमता से
कर्तुम्
करने में, आचरण में
अव्ययम्
अविनाशी, कभी न घटने वाला

कृष्ण इस ज्ञान को 'राजविद्या' कहते हैं — विद्याओं में राजा। यह शुद्ध करने वाला है, धर्म के अनुकूल है, और सीधे अनुभव से समझ में आता है। कोई बाहरी प्रमाण की ज़रूरत नहीं।

जैसे धूप मिलते ही अँधेरा चला जाता है — वैसे ही यह ज्ञान मन के भीतर के अँधेरे को हटाता है। सबसे सुंदर बात यह है कि यह 'सुसुखं कर्तुम्' है — यानी इसे जीवन में उतारना कठिन नहीं है।

इस श्लोक में अध्याय 9 का नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' सार्थक होता है। 'प्रत्यक्षावगमं' शब्द संकेत करता है कि यह ज्ञान तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जाता है।

मुण्डकोपनिषद् (1.1.4) में भी 'परा' और 'अपरा' विद्या का अंतर बताया गया है — यहाँ कृष्ण जो राजविद्या बता रहे हैं वह परा विद्या की श्रेणी में है।

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