कृष्ण इस ज्ञान को 'राजविद्या' कहते हैं — विद्याओं में राजा। यह शुद्ध करने वाला है, धर्म के अनुकूल है, और सीधे अनुभव से समझ में आता है। कोई बाहरी प्रमाण की ज़रूरत नहीं।
जैसे धूप मिलते ही अँधेरा चला जाता है — वैसे ही यह ज्ञान मन के भीतर के अँधेरे को हटाता है। सबसे सुंदर बात यह है कि यह 'सुसुखं कर्तुम्' है — यानी इसे जीवन में उतारना कठिन नहीं है।