यह श्लोक बड़ा सुंदर है। कृष्ण कहते हैं — यज्ञ में जो क्रतु है, जो यज्ञ है, जो स्वधा है, जो ओषधि है, जो मंत्र है, जो घी है, जो अग्नि है, जो हवन की क्रिया है — वह सब मैं हूँ।
इसका अर्थ यह नहीं कि यज्ञ करना ज़रूरी है। इसका अर्थ यह है कि जो भी शुभ कार्य होता है — उसके भीतर वह परमात्मा की ही शक्ति है। पूजा का हर तत्व उसी का रूप है।