महात्माओं का आचरण बताते हुए कृष्ण कहते हैं — वे सदा मेरा कीर्तन करते हैं, दृढ़ व्रत के साथ प्रयत्न करते हैं, भक्ति से प्रणाम करते हैं। यह उनकी साधना है — थकान नहीं, स्वाभाविकता है।
'सततं' और 'नित्ययुक्ताः' — दोनों शब्द निरंतरता की बात करते हैं। यह भजन कभी-कभी नहीं, जीवन की धारा की तरह है। जैसे नदी बिना रुके बहती है।