📿 श्लोक संग्रह

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः

गीता 9.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
मया अध्यक्षेण
मेरी अध्यक्षता में
प्रकृतिः
प्रकृति
सूयते
उत्पन्न करती है
सचराचरम्
चर और अचर सहित
हेतुना अनेन
इसी कारण से
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
जगत्
संसार
विपरिवर्तते
घूमता है, चलता रहता है

कृष्ण कहते हैं — मेरी देखरेख में प्रकृति इस सारी सृष्टि को — चलने वाले और न चलने वाले सभी — उत्पन्न करती है। और इसी कारण यह संसार-चक्र घूमता रहता है।

जैसे एक बड़े घर में मालिक हो तो काम होते हैं — सब करने वाले अलग-अलग हैं, पर दिशा एक है। वैसे ही प्रकृति करती है, पर कृष्ण 'अध्यक्ष' हैं — साक्षी और आधार।

9.10 में 'अध्यक्ष' शब्द महत्वपूर्ण है — अध्यक्ष का अर्थ है जो ऊपर से देखे, संचालन करे। यह 9.9 के 'उदासीनवत्' का पूरक है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.11) में कहा गया है — 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः, सर्वव्यापी, सर्वभूतान्तरात्मा' — वही भाव यहाँ है।

अध्याय 9 · 10 / 34
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