📿 श्लोक संग्रह

अक्षरं ब्रह्म परमं

गीता 8.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
श्रीभगवानुवाच — अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
अक्षरम्
अविनाशी
ब्रह्म
ब्रह्म
परमम्
परम, सर्वोच्च
स्वभावः
अपना स्वरूप
अध्यात्मम्
अध्यात्म
उच्यते
कहा जाता है
भूतभावोद्भवकरः
प्राणियों की उत्पत्ति का कारण
विसर्गः
सृजन-क्रिया
कर्मसंज्ञितः
कर्म नाम से जाना जाता है

अब भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करते हैं। वे कहते हैं — जो कभी नष्ट नहीं होता, वह परम ब्रह्म है। जीव का अपना स्वरूप — अर्थात आत्मा — उसे अध्यात्म कहते हैं। और जो क्रिया प्राणियों को जन्म देती है, उसे कर्म कहते हैं।

इसे ऐसे समझें — जैसे एक पेड़ का बीज कभी बदलता नहीं (वही बीज, वही स्वभाव), वैसे ही ब्रह्म अविनाशी है। पेड़ का अपना गुण — मीठा फल देना या छाया देना — वह उसका स्वभाव है, जैसे आत्मा हमारा स्वभाव है। और बीज से अंकुर निकलने की क्रिया — वह कर्म है।

कृष्ण बड़ी सरलता से गहरी बातें समझा रहे हैं, ठीक जैसे कोई बड़ा-बूढ़ा अपने पोते को जीवन की बड़ी बातें आसान शब्दों में बताता है।

यह श्लोक अर्जुन के पहले तीन प्रश्नों (ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म) का उत्तर देता है। अगला श्लोक (8.4) शेष प्रश्नों — अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ — का उत्तर देता है।

इस अध्याय का नाम "अक्षरब्रह्मयोग" इसी श्लोक के पहले शब्द "अक्षरम्" से आता है — अक्षर अर्थात जो कभी क्षर (नष्ट) न हो।

अध्याय 8 · 3 / 28
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