अब भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करते हैं। वे कहते हैं — जो कभी नष्ट नहीं होता, वह परम ब्रह्म है। जीव का अपना स्वरूप — अर्थात आत्मा — उसे अध्यात्म कहते हैं। और जो क्रिया प्राणियों को जन्म देती है, उसे कर्म कहते हैं।
इसे ऐसे समझें — जैसे एक पेड़ का बीज कभी बदलता नहीं (वही बीज, वही स्वभाव), वैसे ही ब्रह्म अविनाशी है। पेड़ का अपना गुण — मीठा फल देना या छाया देना — वह उसका स्वभाव है, जैसे आत्मा हमारा स्वभाव है। और बीज से अंकुर निकलने की क्रिया — वह कर्म है।
कृष्ण बड़ी सरलता से गहरी बातें समझा रहे हैं, ठीक जैसे कोई बड़ा-बूढ़ा अपने पोते को जीवन की बड़ी बातें आसान शब्दों में बताता है।