📿 श्लोक संग्रह

अधियज्ञः कथं कोऽत्र

गीता 8.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
अधियज्ञः
यज्ञ का अधिष्ठाता
कथम्
कैसे
कः
कौन
अत्र
यहाँ
देहे अस्मिन्
इस शरीर में
मधुसूदन
हे मधुसूदन (कृष्ण)
प्रयाणकाले
मृत्यु के समय
ज्ञेयः असि
जाने जा सकते हो
नियतात्मभिः
संयमी पुरुषों द्वारा

पिछले श्लोक के प्रश्नों को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन दो और प्रश्न पूछते हैं। पहला — इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और कैसे है? दूसरा — मृत्यु के समय संयमी लोग आपको कैसे जान सकते हैं?

यह प्रश्न बहुत गहरा है। अर्जुन जानना चाहते हैं कि जब प्राण निकलने का समय आए, तब भगवान को कैसे याद करें? यह ऐसा प्रश्न है जो हर भक्त के मन में उठता है — अंतिम समय में भगवान से कैसे जुड़ें?

जैसे परीक्षा से पहले बच्चा अपने गुरु से पूछता है कि सबसे ज़रूरी बात क्या याद रखूँ — वैसे ही अर्जुन कृष्ण से जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा (मृत्यु) के बारे में पूछ रहे हैं।

यह श्लोक 8.1 के साथ मिलकर अर्जुन के सात प्रश्नों को पूरा करता है। कृष्ण अगले श्लोकों (8.3-8.4) में इन सभी प्रश्नों के उत्तर क्रमशः देते हैं।

मृत्यु के समय भगवान को जानने का प्रश्न इस पूरे अध्याय का केंद्रीय विषय बन जाता है — श्लोक 8.5 से 8.13 तक इसी पर विस्तार से चर्चा होती है।

अध्याय 8 · 2 / 28
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