इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से सात प्रश्न पूछ रहे हैं। पहला प्रश्न है — ब्रह्म क्या है? दूसरा — अध्यात्म क्या है? तीसरा — कर्म क्या है? और फिर अधिभूत तथा अधिदैव क्या हैं? जैसे कोई जिज्ञासु बच्चा अपने दादा-दादी से एक के बाद एक सवाल पूछता है, वैसे ही अर्जुन कृष्ण से पूछ रहे हैं।
अर्जुन की यह जिज्ञासा बहुत स्वाभाविक है। पिछले अध्याय के अंत में कृष्ण ने कई गूढ़ शब्द कहे थे — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म — और अर्जुन उन सबका अर्थ स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि प्रश्न पूछना कभी गलत नहीं होता। जब मन में कोई बात समझ न आए, तो गुरु से विनम्रता से पूछना चाहिए — ठीक वैसे जैसे अर्जुन पूछ रहे हैं।