📿 श्लोक संग्रह

परस्तस्मात्तु भावोऽन्यः

गीता 8.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
परः
परे
तस्मात्
उससे
तु
लेकिन
भावः अन्यः
एक और तत्त्व
अव्यक्तः
अप्रकट
अव्यक्तात्
(भौतिक) अव्यक्त से भी
सनातनः
शाश्वत, सनातन
यः सः
जो वह
सर्वेषु भूतेषु
सब प्राणियों के
नश्यत्सु
नष्ट होने पर भी
न विनश्यति
नष्ट नहीं होता

कृष्ण कहते हैं — लेकिन उस भौतिक अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे एक और तत्त्व है — जो अव्यक्त है, सनातन है, और सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। यह परम तत्त्व — परमात्मा — सृष्टि और प्रलय दोनों से परे है।

इसे ऐसे समझें — बादल आते हैं और जाते हैं, बारिश होती है और रुकती है, लेकिन आकाश सदा वैसा ही रहता है। वैसे ही संसार बनता है और बिगड़ता है, लेकिन परमात्मा सदा अपरिवर्तित रहते हैं।

यह श्लोक बड़ी आशा देता है — इस बदलते संसार में कुछ तो है जो कभी नहीं बदलता, कभी नष्ट नहीं होता। और वही हमारा असली आश्रय है।

यह श्लोक सृष्टि-प्रलय चक्र (8.17-8.19) के बाद उस शाश्वत तत्त्व की ओर इंगित करता है जो इस चक्र से मुक्त है। यही अक्षर ब्रह्म है — जिसके नाम पर इस अध्याय का नाम "अक्षरब्रह्मयोग" है।

अगला श्लोक (8.21) इसी तत्त्व को "परमां गतिम्" कहता है — यही वह परम गंतव्य है जहाँ पहुँचकर कोई लौटता नहीं।

अध्याय 8 · 20 / 28
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