📿 श्लोक संग्रह

भूतग्रामः स एवायं

गीता 8.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
भूतग्रामः
प्राणियों का समूह
सः एव अयम्
वही यह
भूत्वा भूत्वा
बार-बार उत्पन्न होकर
प्रलीयते
लीन हो जाता है
रात्र्यागमे
रात के आने पर
अवशः
विवश होकर
पार्थ
हे पार्थ
प्रभवति
उत्पन्न होता है
अहरागमे
दिन के आने पर

कृष्ण कहते हैं — यही प्राणियों का समूह बार-बार उत्पन्न होता है और बार-बार लीन हो जाता है। ब्रह्मा की रात आने पर विवश होकर सब नष्ट होता है, और दिन आने पर फिर से प्रकट होता है।

"अवशः" — विवश होकर — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इन प्राणियों की अपनी कोई इच्छा नहीं चलती — प्रकृति के नियम के अनुसार वे जन्मते हैं और मरते हैं। जैसे लहरें समुद्र में उठती हैं और गिरती हैं — उनका अपना कोई वश नहीं।

यह सुनकर मन में वैराग्य जागता है — यदि यह संसार बार-बार बनता और मिटता है, तो इसमें चिपकने का क्या लाभ? बेहतर है कि उस शाश्वत परमात्मा की शरण लें जो इस चक्र से परे हैं।

श्लोक 8.17-8.19 एक समूह है जो सृष्टि-प्रलय चक्र का वर्णन करता है। अगले श्लोक (8.20) में कृष्ण उस तत्त्व की बात करते हैं जो इस चक्र से परे है — "परस्तस्मात्तु भावोऽन्यः"।

"भूत्वा भूत्वा प्रलीयते" — बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु — यही संसार की वास्तविकता है। इसी से बचने का मार्ग गीता आगे बताती है।

अध्याय 8 · 19 / 28
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