कृष्ण कहते हैं — यही प्राणियों का समूह बार-बार उत्पन्न होता है और बार-बार लीन हो जाता है। ब्रह्मा की रात आने पर विवश होकर सब नष्ट होता है, और दिन आने पर फिर से प्रकट होता है।
"अवशः" — विवश होकर — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इन प्राणियों की अपनी कोई इच्छा नहीं चलती — प्रकृति के नियम के अनुसार वे जन्मते हैं और मरते हैं। जैसे लहरें समुद्र में उठती हैं और गिरती हैं — उनका अपना कोई वश नहीं।
यह सुनकर मन में वैराग्य जागता है — यदि यह संसार बार-बार बनता और मिटता है, तो इसमें चिपकने का क्या लाभ? बेहतर है कि उस शाश्वत परमात्मा की शरण लें जो इस चक्र से परे हैं।