📿 श्लोक संग्रह

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः

गीता 8.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
अव्यक्तात्
अव्यक्त (अप्रकट) से
व्यक्तयः
प्रकट प्राणी
सर्वाः
सभी
प्रभवन्ति
उत्पन्न होते हैं
अहरागमे
दिन के आने पर
रात्र्यागमे
रात के आने पर
प्रलीयन्ते
लीन हो जाते हैं
तत्र एव
उसी में
अव्यक्तसंज्ञके
अव्यक्त नामक तत्त्व में

कृष्ण सृष्टि और प्रलय का चक्र समझा रहे हैं। ब्रह्मा का दिन शुरू होते ही अव्यक्त (अप्रकट) प्रकृति से सारे प्राणी प्रकट होते हैं — जैसे सुबह होते ही फूल खिलते हैं। और ब्रह्मा की रात आते ही सब कुछ वापस उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है — जैसे रात में फूल मुरझा जाते हैं।

यह बात बहुत गहरी है। जैसे बीज से पौधा निकलता है और फिर मुरझाकर बीज में ही समा जाता है — वैसे ही यह पूरी सृष्टि बार-बार प्रकट होती है और बार-बार अप्रकट हो जाती है।

यह चक्र अनंत काल से चल रहा है — इसी से पता चलता है कि ब्रह्मलोक भी शाश्वत नहीं है, क्योंकि वहाँ भी सृष्टि और प्रलय का यह खेल चलता रहता है।

यह श्लोक 8.17 की काल-गणना को व्यावहारिक रूप देता है — ब्रह्मा के दिन में सृष्टि, रात में प्रलय। अगला श्लोक (8.19) इसी विषय को और आगे ले जाता है।

भारतीय दर्शन में सृष्टि-प्रलय का यह चक्रीय सिद्धांत बहुत प्राचीन है — ऋग्वेद के नासदीय सूक्त से लेकर पुराणों तक इसकी चर्चा मिलती है।

अध्याय 8 · 18 / 28
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