कृष्ण सृष्टि और प्रलय का चक्र समझा रहे हैं। ब्रह्मा का दिन शुरू होते ही अव्यक्त (अप्रकट) प्रकृति से सारे प्राणी प्रकट होते हैं — जैसे सुबह होते ही फूल खिलते हैं। और ब्रह्मा की रात आते ही सब कुछ वापस उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है — जैसे रात में फूल मुरझा जाते हैं।
यह बात बहुत गहरी है। जैसे बीज से पौधा निकलता है और फिर मुरझाकर बीज में ही समा जाता है — वैसे ही यह पूरी सृष्टि बार-बार प्रकट होती है और बार-बार अप्रकट हो जाती है।
यह चक्र अनंत काल से चल रहा है — इसी से पता चलता है कि ब्रह्मलोक भी शाश्वत नहीं है, क्योंकि वहाँ भी सृष्टि और प्रलय का यह खेल चलता रहता है।