📿 श्लोक संग्रह

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति

गीता 8.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
यत् अक्षरम्
जिस अविनाशी को
वेदविदः
वेद जानने वाले
वदन्ति
कहते हैं
विशन्ति
प्रवेश करते हैं
यतयः
संन्यासी
वीतरागाः
आसक्ति-रहित
इच्छन्तः
चाहते हुए
ब्रह्मचर्यम्
ब्रह्मचर्य
चरन्ति
आचरण करते हैं
तत् ते पदम्
वह पद तुम्हें
संग्रहेण
संक्षेप में
प्रवक्ष्ये
बताऊँगा

कृष्ण कहते हैं — जिस अविनाशी तत्त्व को वेदों के ज्ञाता बताते हैं, जिसमें वैराग्य-संपन्न संन्यासी प्रवेश करते हैं, और जिसकी प्राप्ति की इच्छा से साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस परम पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ।

यह श्लोक एक प्रकार की भूमिका है — कृष्ण कह रहे हैं कि अब मैं तुम्हें वह बात बताने जा रहा हूँ जो ऋषि-मुनियों ने वर्षों की तपस्या से जानी। जैसे कोई दादा अपने पोते को कहे — "बेटा, अब मैं तुम्हें वह बात बताता हूँ जो मेरे दादा ने मुझे बताई थी।"

"संग्रहेण प्रवक्ष्ये" — संक्षेप में बताऊँगा। कृष्ण जानते हैं कि अर्जुन युद्धभूमि पर है, इसलिए लंबी बात नहीं, सार की बात करेंगे।

यह श्लोक अगले दो श्लोकों (8.12-8.13) की भूमिका है, जिनमें कृष्ण योग-साधना की संक्षिप्त विधि बताते हैं — इंद्रियों का संयम, ओंकार का उच्चारण, और प्राण का नियंत्रण।

"अक्षर" शब्द फिर आया है — यही इस अध्याय का केंद्रीय विषय है। अक्षर ब्रह्म — जो कभी नष्ट नहीं होता, वही परम लक्ष्य है।

अध्याय 8 · 11 / 28
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