📿 श्लोक संग्रह

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं

गीता 8.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अर्जुन उवाच — किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
किम्
क्या
तत्
वह
ब्रह्म
ब्रह्म (परम तत्त्व)
अध्यात्मम्
अध्यात्म (आत्मा का स्वरूप)
कर्म
कर्म
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम (कृष्ण)
अधिभूतम्
भौतिक जगत का तत्त्व
प्रोक्तम्
कहा गया है
अधिदैवम्
दैवी तत्त्व
उच्यते
कहा जाता है

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से सात प्रश्न पूछ रहे हैं। पहला प्रश्न है — ब्रह्म क्या है? दूसरा — अध्यात्म क्या है? तीसरा — कर्म क्या है? और फिर अधिभूत तथा अधिदैव क्या हैं? जैसे कोई जिज्ञासु बच्चा अपने दादा-दादी से एक के बाद एक सवाल पूछता है, वैसे ही अर्जुन कृष्ण से पूछ रहे हैं।

अर्जुन की यह जिज्ञासा बहुत स्वाभाविक है। पिछले अध्याय के अंत में कृष्ण ने कई गूढ़ शब्द कहे थे — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म — और अर्जुन उन सबका अर्थ स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि प्रश्न पूछना कभी गलत नहीं होता। जब मन में कोई बात समझ न आए, तो गुरु से विनम्रता से पूछना चाहिए — ठीक वैसे जैसे अर्जुन पूछ रहे हैं।

यह श्लोक भगवद्गीता के आठवें अध्याय अक्षरब्रह्मयोग का प्रारंभ है। सातवें अध्याय के अंत में कृष्ण ने ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का उल्लेख किया था, जिससे अर्जुन के मन में ये प्रश्न उठे।

अगले श्लोक (8.2) में अर्जुन अपने शेष प्रश्न — अधियज्ञ और मृत्यु के समय ईश्वर को कैसे जानें — पूछते हैं। फिर श्लोक 8.3 से कृष्ण एक-एक करके सभी उत्तर देते हैं।

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