7.8 में कृष्ण ने जल का रस, चंद्र-सूर्य का प्रकाश, वेदों में ओंकार बताया। यहाँ वे और आगे जाते हैं — मैं पृथ्वी की वह पवित्र सुगंध हूँ। जब वर्षा के बाद मिट्टी से जो खुशबू उठती है — वह मैं हूँ।
अग्नि में जो तेज है, दीपक की जो रोशनी है — वह मैं हूँ। सब प्राणियों में जो जीवन है, जो साँस चल रही है — वह भी मैं हूँ। और जो साधु तपस्या करते हैं, उनकी तप-शक्ति — वह भी मैं हूँ।
यह श्लोक बच्चों के लिए बहुत सुंदर है। बाग़ में फूल की सुगंध में, दादी के हाथ में जो जीवन है — उसी में परमात्मा है।