पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि सब कुछ मुझमें गुँथा है। अब इस श्लोक में वे बताते हैं कि वे किन-किन रूपों में मौजूद हैं। पानी पीओ तो उसमें जो रस मिलता है — वह मैं हूँ। सूरज और चाँद में जो रोशनी दिखती है — वह मैं हूँ।
कितनी सरल बात है — जब गर्मी में प्यास लगती है और ठंडा पानी पीते हो, तो जो तृप्ति मिलती है, वह भगवान का ही रूप है। सुबह सूरज की किरणें देखो — वह प्रकाश भगवान है। रात को चाँद की शीतल चाँदनी — वह भी भगवान है। वे हर जगह मौजूद हैं।
वेदों में ॐकार — वह भी भगवान हैं। आकाश में जो ध्वनि गूँजती है — वह भी भगवान हैं। और मनुष्यों में जो पराक्रम है, हिम्मत है, मेहनत करने का बल है — वह भी भगवान हैं। इस तरह रोज़मर्रा की हर चीज़ में ईश्वर को देखना — यही इस श्लोक की शिक्षा है।