कृष्ण स्पष्ट कहते हैं — सारे प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (परा और अपरा) से जन्मे हैं। और मैं ही इस पूरे जगत का आरंभ भी हूँ और अंत भी।
जैसे एक नदी किसी पहाड़ से निकलती है और अंत में समुद्र में मिल जाती है — नदी का आदि भी पहाड़ है और अंत भी। वैसे ही यह सारा संसार कृष्ण से निकला है और उन्हीं में लौटेगा।
'प्रभवः प्रलयस्तथा' — उद्गम और लय दोनों। यह एक बड़ा वचन है। आगे के श्लोकों में कृष्ण इसे अनुभव के स्तर पर समझाएँगे।