कृष्ण कहते हैं — मेरी प्रकृति आठ भागों में बँटी है। पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — और तीन भीतरी तत्व — मन, बुद्धि, अहंकार। इन्हें 'अपरा प्रकृति' कहते हैं — जड़ या निचली प्रकृति।
जैसे एक बाग़ में मिट्टी, पानी, धूप, हवा सब मिलकर फूल बनाते हैं — ये सब अलग-अलग हैं लेकिन एक ही माली के बाग़ के हैं। वैसे ही ये आठों तत्व भिन्न-भिन्न दिखते हैं लेकिन सबका मूल एक ही परमात्मा है।
यह श्लोक बताता है कि बाहर जो हम देखते हैं और भीतर जो अनुभव करते हैं — वह सब परमात्मा की ही प्रकृति का हिस्सा है।