यह श्लोक बहुत ईमानदार बात कहता है। हजारों लोगों में कोई एक परमात्मा को जानने की कोशिश करता है। और जो कोशिश भी करते हैं, उनमें भी शायद कोई एक ही मुझे सच में जान पाता है।
यह हताशा की बात नहीं है — यह दुर्लभता का सम्मान है। जैसे दादा कहें — हजारों बच्चे खेलते हैं, उनमें से कोई एक सच्चे मन से पढ़ता है। और पढ़ने वालों में भी कोई एक ही गहरी समझ पाता है।
यह श्लोक सुनकर निराश होने की नहीं, जिज्ञासा जगाने की बात है। आगे कृष्ण वही रास्ता खोलने वाले हैं।