📿 श्लोक संग्रह

इच्छाद्वेषसमुत्थेन

गीता 7.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
इच्छाद्वेष समुत्थेन
इच्छा और द्वेष से उत्पन्न
द्वन्द्वमोहेन
द्वंद्व के मोह से
भारत
हे भारत (अर्जुन)
सर्वभूतानि
सब प्राणी
सम्मोहम्
पूरे मोह को
सर्गे
जन्म लेते समय
यान्ति
प्राप्त होते हैं
परन्तप
हे परंतप (अर्जुन)

कृष्ण बताते हैं कि जगत परमात्मा को क्यों नहीं जान पाता — इच्छा और द्वेष के द्वंद्व के कारण। जन्म लेते ही सब प्राणी इस द्वंद्व-मोह में पड़ जाते हैं।

यह स्वाभाविक है। बच्चा पैदा होते ही रोता है — उसे कुछ चाहिए (इच्छा) और कुछ दुखदायी लगता है (द्वेष)। यह दोनों साथ आते हैं। और जब तक ये हैं, तब तक परमात्मा को जानना कठिन है।

'सर्गे' — जन्म के साथ ही यह मोह आता है। यह कोई व्यक्तिगत गलती नहीं — यह संसार की प्रकृति है। लेकिन इसे पार किया जा सकता है — अगला श्लोक बताएगा कैसे।

7.26 में परमात्मा की सर्वज्ञता और जगत की अज्ञता। 7.27 में उस अज्ञता का मूल कारण — द्वंद्व-मोह। 7.28 में उपाय — पाप-क्षय और पुण्य-कर्म। यह तीन श्लोकों की इकाई है।

कठोपनिषद् में यमराज नचिकेता से कहते हैं — 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' — यह आत्मा बलहीन को नहीं मिलती। गीता का द्वंद्व-मोह उस बलहीनता का एक रूप है।

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