कृष्ण कहते हैं — मैं सबको प्रकट नहीं होता। मेरी योगमाया मुझे ढँके रहती है। इसीलिए यह मोहित जगत मेरे अजन्मे, अविनाशी स्वरूप को नहीं पहचान पाता।
जैसे बादलों में ढँका सूर्य — सूर्य तो है, लेकिन बादल के कारण सीधे नहीं दिखता। योगमाया वह बादल है। लेकिन यह बादल भी उसी सूर्य की शक्ति से बना है।
यहाँ 'योगमाया' और 7.14 की 'दैवी माया' में फर्क है — योगमाया परमात्मा की रहस्यमय शक्ति है जो उन्हें ढँकती है। यह जड़ माया से अलग है।