यह श्लोक बहुत उदार है। कृष्ण कहते हैं — जो भक्त जिस भी देवता के रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस भक्त की उस देवता के प्रति श्रद्धा को मैं स्वयं दृढ़ करता हूँ।
यानी परमात्मा किसी की श्रद्धा को कमज़ोर नहीं करता — चाहे वह किसी भी रूप की पूजा करे। जैसे एक दादा अपने पोते के किसी भी अच्छे प्रयास को प्रोत्साहित करते हैं।
यह श्लोक बताता है कि भक्ति का मूल श्रद्धा है। जहाँ सच्ची श्रद्धा है, वहाँ परमात्मा की शक्ति काम करती है।