📿 श्लोक संग्रह

उदाराः सर्व एवैते

गीता 7.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
उदाराः
उदार, श्रेष्ठ
सर्वे एव
सभी ही
एते
ये
ज्ञानी तु
किंतु ज्ञानी
आत्मा एव
मेरा स्वरूप ही
मे मतम्
मेरा मत है
आस्थितः
स्थित
स हि
वह निश्चय ही
युक्तात्मा
युक्त मन वाला
माम् एव
केवल मुझको
अनुत्तमाम्
सर्वोत्तम
गतिम्
गति, लक्ष्य

कृष्ण यहाँ बड़ी करुणा से कहते हैं — ये सभी चारों भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ हैं। कोई छोटा नहीं। लेकिन ज्ञानी के बारे में मेरा मत यह है कि वह तो मेरा स्वरूप ही है।

यह एक अद्भुत बात है। भगवान ज्ञानी को अपना स्वरूप कह रहे हैं। जैसे सूर्य और उसकी रोशनी — रोशनी सूर्य से अलग नहीं है। ज्ञानी और परमात्मा के बीच वह दूरी मिट जाती है।

'मामेवानुत्तमां गतिम्' — वह सर्वोत्तम लक्ष्य के रूप में केवल मुझमें स्थित है। यह भक्ति की पूर्णावस्था है।

7.16, 7.17, 7.18 एक इकाई है। 7.16 — चार भक्त; 7.17 — ज्ञानी श्रेष्ठ; 7.18 — सब उदार हैं, ज्ञानी मेरा आत्मा है। यह क्रम भक्ति-मार्ग की पूर्णता दिखाता है।

माण्डूक्योपनिषद् में तुरीय अवस्था का वर्णन है जहाँ व्यक्ति और परमात्मा की सीमा मिट जाती है। गीता का 'आत्मैव मे मतम्' उसी अनुभव का सरल कथन है।

अध्याय 7 · 18 / 30
अध्याय 7 · 18 / 30 अगला →