📿 श्लोक संग्रह

न मां दुष्कृतिनो मूढाः

गीता 7.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
नहीं
माम्
मुझको
दुष्कृतिनः
बुरे कर्म करने वाले
मूढाः
मूढ़, मोहित
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
नराधमाः
मनुष्यों में नीच
मायया अपहृत ज्ञानाः
माया द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया
आसुरम्
आसुरी
भावम्
भाव, स्वभाव
आश्रिताः
आश्रय लेने वाले

7.14 में कृष्ण ने कहा — जो मेरी शरण लेते हैं वे माया पार कर लेते हैं। अब वे कहते हैं — कौन शरण नहीं लेता? चार प्रकार के लोग — जो बुरे कर्म करते हैं, जो मोह में डूबे हैं, जिनका ज्ञान माया ने हर लिया, और जो आसुरी स्वभाव में रहते हैं।

यह श्लोक किसी को दोष देने के लिए नहीं है। यह एक चित्र है — जब तक मन इन अवस्थाओं में होता है, तब तक परमात्मा की ओर मुड़ना नहीं होता। यह बंधन का स्वरूप है।

लेकिन यह स्थायी नहीं है। अगले श्लोक में कृष्ण उन लोगों की बात करेंगे जो शरण लेते हैं। यह द्वार बंद नहीं है।

7.15 और 7.16 एक जोड़ी हैं — पहले वे जो शरण नहीं लेते, फिर वे जो लेते हैं। 'आसुरं भावम्' का अर्थ असुर-जाति नहीं — यह एक मानसिक अवस्था का वर्णन है।

भागवत पुराण में भी आसुरी भाव का वर्णन है — जो अहंकार, लोभ और क्रूरता से ग्रस्त है। गीता यहाँ उसी परंपरा में बात कर रही है।

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