📿 श्लोक संग्रह

दैवी ह्येषा गुणमयी

गीता 7.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
दैवी
दिव्य, भगवान की
हि
निश्चय ही
एषा
यह
गुणमयी
गुणों से बनी
मम
मेरी
माया
माया
दुरत्यया
कठिनता से पार होने वाली
माम् एव
केवल मुझको
ये
जो
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
मायाम् एताम्
इस माया को
तरन्ति
पार कर लेते हैं
ते
वे

7.13 में समस्या थी — माया जगत को मोहित करती है। यहाँ उपाय है — यह माया मेरी है, दैवी है। अकेले अपनी ताकत से इसे पार करना बहुत कठिन है।

लेकिन जो मेरी शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर लेते हैं। जैसे तेज नदी में अकेले तैरना मुश्किल हो — लेकिन नाविक के साथ हो तो वही नदी पार हो जाती है। परमात्मा वह नाविक है।

'मामेव ये प्रपद्यन्ते' — केवल मुझको। यह एकनिष्ठ शरण की बात है। इस श्लोक में कृष्ण की करुणा दिखती है — वे कह रहे हैं, तुम अकेले मत लड़ो, मेरे पास आओ।

7.13-7.14 मिलकर माया की समस्या और उसका समाधान एक साथ देते हैं। 'प्रपद्यन्ते' (शरण लेते हैं) शब्द गीता में बहुत महत्वपूर्ण है। अंतिम अध्याय 18.66 में भी कृष्ण 'एकं शरणं व्रज' कहते हैं।

भागवत पुराण में भी माया-शक्ति का वर्णन है जो भगवान की ही शक्ति है लेकिन जीव को भ्रमित करती है। गीता का यह श्लोक उसी भागवत-परंपरा का सार है।

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