7.13 में समस्या थी — माया जगत को मोहित करती है। यहाँ उपाय है — यह माया मेरी है, दैवी है। अकेले अपनी ताकत से इसे पार करना बहुत कठिन है।
लेकिन जो मेरी शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर लेते हैं। जैसे तेज नदी में अकेले तैरना मुश्किल हो — लेकिन नाविक के साथ हो तो वही नदी पार हो जाती है। परमात्मा वह नाविक है।
'मामेव ये प्रपद्यन्ते' — केवल मुझको। यह एकनिष्ठ शरण की बात है। इस श्लोक में कृष्ण की करुणा दिखती है — वे कह रहे हैं, तुम अकेले मत लड़ो, मेरे पास आओ।