कृष्ण कहते हैं — इन तीन गुणों के भावों से यह सारा जगत मोहित है। और इसीलिए वह मुझे नहीं पहचानता — जो इन सबसे परे और अविनाशी हूँ।
जैसे रात में एक बच्चा सपने में इतना खो जाता है कि उसे पता नहीं चलता कि वह सो रहा है। सपने के पात्र उसे सच लगते हैं। वैसे ही तीन गुणों के खेल में लिप्त मनुष्य परमात्मा को भूल जाता है।
लेकिन यह श्लोक निराशा नहीं देता। यह समस्या बताता है — और अगला श्लोक उसका उपाय। जो इस माया को पार कर लेते हैं, वे मुझे पा लेते हैं।