कृष्ण एक बहुत सुंदर बात कहते हैं — सत्व, रज, तम — ये तीनों गुणों के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ — वे मुझमें हैं।
यह फर्क समझना जरूरी है। जैसे दीपक की रोशनी में कमरे की सारी चीजें दिखती हैं — रोशनी कमरे में है, लेकिन कमरा रोशनी में है। रोशनी कभी कमरे की मैल नहीं होती। वैसे ही परमात्मा तीनों गुणों का स्रोत है लेकिन उनसे बँधा नहीं।
यह श्लोक भक्त को बड़ा आश्वासन देता है — जगत के सारे भाव परमात्मा की शक्ति से हैं, लेकिन परमात्मा स्वयं इन सबसे परे और मुक्त है।