📿 श्लोक संग्रह

ये चैव सात्त्विका भावाः

गीता 7.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥
ये च एव
जो भी
सात्त्विकाः
सात्विक (शुद्धता-प्रधान)
भावाः
भाव, अवस्थाएँ
राजसाः
राजसी (क्रिया-प्रधान)
तामसाः च
और तामसी (जड़ता-प्रधान)
ये
जो
मत्तः एव
मुझसे ही
इति
ऐसा
तान् विद्धि
उन्हें जान
न तु
लेकिन नहीं
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
ते मयि
वे मुझमें

कृष्ण एक बहुत सुंदर बात कहते हैं — सत्व, रज, तम — ये तीनों गुणों के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ — वे मुझमें हैं।

यह फर्क समझना जरूरी है। जैसे दीपक की रोशनी में कमरे की सारी चीजें दिखती हैं — रोशनी कमरे में है, लेकिन कमरा रोशनी में है। रोशनी कभी कमरे की मैल नहीं होती। वैसे ही परमात्मा तीनों गुणों का स्रोत है लेकिन उनसे बँधा नहीं।

यह श्लोक भक्त को बड़ा आश्वासन देता है — जगत के सारे भाव परमात्मा की शक्ति से हैं, लेकिन परमात्मा स्वयं इन सबसे परे और मुक्त है।

त्रिगुण सिद्धांत — सत्व, रज, तम — सांख्य दर्शन का मूल है। गीता का 14वाँ अध्याय गुणत्रय-विभाग-योग पूरी तरह इसी पर आधारित है। 7.12 उसकी भूमिका है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् (4.5) में 'अजाम एकाम्' — एक अजन्मी (प्रकृति) जो लाल, श्वेत, कृष्ण (तीन गुणों का प्रतीक) है — यह त्रिगुण की उपनिषद्-परंपरा है। कृष्ण यहाँ उसी परंपरा में बोल रहे हैं।

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